वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार
लखनऊ। दिवाली के अवसर पर भगवान गणेश और माता लक्ष्मी की पूजा का विशेष महत्व है। माता लक्ष्मी को धन, वैभव और समृद्धि की देवी माना जाता है, जबकि भगवान गणेश बुद्धि, विवेक और बाधा दूर करने वाले विघ्नहर्ता हैं। इसलिए दिवाली के दिन दोनों की प्रतिमाओं का पूजन शुभ और मंगलकारी माना गया है। हालांकि, शास्त्रों के अनुसार मूर्ति खरीदते समय कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है, वरना पूजा का पूर्ण फल नहीं मिलता। सबसे शुभ मानी जाती है मिट्टी से बनी मूर्तियां। शास्त्रों के अनुसार मिट्टी का निर्माण स्वयं ब्रह्माजी ने किया था, इसलिए मिट्टी से बनी प्रतिमाओं की पूजा सबसे फलदायी होती है। यदि मूर्ति गंगा, तालाब, कुएं या गौशाला की मिट्टी से बनी हो, तो वह और भी पवित्र एवं शुभ मानी जाती है। ऐसी प्रतिमाओं की पूजा से घर में स्थिरता, सुख-समृद्धि और सौभाग्य का वास होता है।
पूजा के लिए लक्ष्मी और गणेश की प्रतिमा हमेशा अलग-अलग खरीदें, कभी भी दोनों की एक साथ जुड़ी हुई मूर्ति न लें। गणेशजी की प्रतिमा ऐसी चुनें, जिसमें उनके हाथ में मोदक हो और उनके वाहन मूषक (चूहा) का चित्रण अवश्य हो। यह ज्ञान, आनंद और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। भगवान गणेश की मूर्ति लाल या सफेद रंग की होना श्रेष्ठ मानी गई है। लाल रंग शक्ति और उत्साह का प्रतीक है, जबकि सफेद रंग शांति और पवित्रता का द्योतक है।
माता लक्ष्मी की मूर्ति कमल के फूल पर विराजमान होनी चाहिए। शास्त्रों में कहा गया है कि उल्लू पर विराजमान लक्ष्मी “काली रूप” का प्रतीक होती हैं, जबकि कमल पर बैठी लक्ष्मी स्थिर सुख-समृद्धि और सौंदर्य की प्रतीक हैं। उनकी मूर्ति में दाहिना हाथ वरमुद्रा में और बायां हाथ सोने के सिक्कों की वर्षा करते हुए होना शुभ माना जाता है। लक्ष्मीजी की मूर्ति सदैव बैठी हुई मुद्रा में खरीदें। खड़ी मुद्रा वाली लक्ष्मी “जाने की मुद्रा” मानी जाती हैं, जो घर से धन और सौभाग्य के प्रस्थान का संकेत देती है। मूर्ति खरीदते समय यह भी देखें कि मां लक्ष्मी का दाहिना हाथ वरमुद्रा में हो और बाएं हाथ से वे सोने के सिक्कों की वर्षा कर रही हों. यह मुद्रा इस बात का संकेत है कि देवी अपने भक्तों पर धन, वैभव और सौभाग्य की वर्षा कर रही हैं।