– हीरो ने किया था छठ व्रत, 64 साल पहले फणी मजूमदार की फिल्म ‘भैया’ बनी थी मिसाल
वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार
लखनऊ। छठ पूजा भारतीय लोक परंपराओं में वह पर्व है जो आस्था, अनुशासन और प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना को सबसे संवेदनशील रूप में प्रस्तुत करता है। बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और झारखंड जैसे क्षेत्रों में यह न सिर्फ धार्मिक बल्कि सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक बन चुका है। आज भी जब घाटों पर लोग डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देने के लिए उमड़ते हैं, उस क्षण की पवित्रता में भक्ति के साथ-साथ सामूहिकता की ताकत भी झलकती है। सिनेमा ने हमेशा समाज के विविध रंगों और उत्सवों को अपने परदे पर उतारने की कोशिश की है। मगर छठ पर्व की कहानी को बड़े पर्दे पर लाने का साहस सबसे पहले निर्देशक फणी मजूमदार ने वर्ष 1961 में किया था। उनकी फिल्म ‘भैया’ इस मायने में ऐतिहासिक मानी जाती है, क्योंकि यह पहली बार था जब छठ पूजा के अनुष्ठान को एक संपूर्ण सिनेमाई दृश्य के रूप में प्रस्तुत किया गया। नालंदा चित्र प्रतिष्ठान के बैनर तले बनी यह मगधी भाषा की फिल्म सरल संवादों और गहन भावनाओं के कारण आम दर्शकों के दिल तक उतर गई।
तरुण बोस, पद्मा खन्ना, विजय चौधरी, हेलेन, शुभा खोटे और अचला सचदेव जैसे कलाकारों से सजी इस फिल्म की कहानी मानवीय रिश्तों की कोमल परतों को उजागर करती है। एक युवा अपने सौतेले भाई के प्रेम के आगे अपना प्रेम बलिदान कर देता है। दिलचस्प यह है कि कहानी की शुरुआत ही छठ पूजा के दृश्य से होती है, जहां पुरुष पात्र स्वयं छठ का व्रत निभाता दिखता है। यह प्रस्तुति उस समय के सिनेमा में लिंग-भूमिकाओं की परंपरागत सीमाओं को तोड़ने का एक सुंदर उदाहरण थी।
फणी मजूमदार ने पहले देव आनंद और मीना कुमारी जैसे सितारों के साथ काम किया था, जिससे उनकी फिल्म निर्माण की समझ परिपक्व हो चुकी थी। उन्होंने ‘भैया’ के संगीत विभाग में भी हिंदी फिल्म उद्योग के प्रमुख नामों को शामिल किया। यही कारण था कि फिल्मों के साथ-साथ भोजपुरी और मगधी संगीत परंपरा में भी छठ गीतों का प्रभाव गहराई तक उतर गया। बाद के दशकों में जब स्वर कोकिला शारदा सिन्हा ने छठ गीतों को अपनी आवाज़ दी, तो यह परंपरा घर-घर तक पहुंच गई। उनके गीतों ने छठ को धार्मिक सीमाओं से आगे बढ़ाकर सांस्कृतिक उत्सव बना दिया।
छठ सिर्फ एक पूजा नहीं, बल्कि जीवन के प्रति कृतज्ञता का अनुष्ठान है। फणी मजूमदार की ‘भैया’ इस आस्था को फिल्म के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाने वाला वह सेतु थी, जिसने सिनेमा को समाज की लोकधारा से जोड़ा। आज, जब छठ पर्व एक वैश्विक पहचान पा चुका है, तो यह स्मरण करना जरूरी है कि इसकी पहली झलक बड़े पर्दे पर छह दशक पहले ही दिख चुकी थी—उस दौर में, जब सिनेमा सामाजिक प्रतिबिंब बनने की राह पर था।