– दादा नाना साहेब ने रखा संघ की नींव में योगदान
वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार
लखनऊ। संघ के 100 साल पूरे होने के इस दौर में जब इसकी यात्रा के अनेक पहलुओं पर चर्चा हो रही है तो भागवत परिवार का नाम विशेष रूप से लिया जाता है। RSS की नींव का पत्थर थे संघ प्रमुख भागवत के दादा, पिता ने विस्तार में निभाया था अहम रोल आरएसएस के वर्तमान प्रमुख मोहन भागवत के परिवार में संघ की विरासत बहुत पुरानी है। संघ के संस्थापक डॉक्टर हेडगेवार का साथ देने से लेकर, नरेंद्र मोदी जैसे दिग्गज नेताओं को तैयार करने में भागवत परिवार का बड़ा योगदान है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को जिस प्रकार जमीन से जोड़कर एक विशाल वटवृक्ष के रूप में विकसित किया गया, उसमें अनेक परिवारों ने पीढ़ी दर पीढ़ी योगदान दिया। मोहन भागवत का परिवार इसका सबसे सशक्त उदाहरण है। उनके दादा नाना साहेब ने जहां डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के कठिन कार्यों को सरल बनाने का काम किया, वहीं उनके पिता मधुकर राव ने संघ को नए क्षेत्रों में फैलाने में अग्रणी भूमिका निभाई। यही पारिवारिक विरासत आगे चलकर मोहन भागवत के जीवन में गहरी छाप छोड़ गई और उन्होंने स्वयं संघ के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचने का सफर तय किया।
श्रीनारायण पांडुरंग भागवत, जिन्हें लोग नाना साहेब के नाम से जानते थे, का जन्म 1884 में महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले के वीरमाल गांव में हुआ। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, इसलिए वे अपने मामाजी के पास नागपुर जिले के कस्बे काटोल चले गए। वहां से पढ़ाई कर उन्होंने प्रयागराज विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री प्राप्त की और फिर वरोरा नगरपालिका में कारोबार के साथ वकालत शुरू की। वरोरा उन दिनों कांग्रेस गतिविधियों का केंद्र था और नाना साहेब कांग्रेस से जुड़ भी गए। धीरे-धीरे उनकी गिनती नामी वकीलों में होने लगी। इसी दौरान उनकी मुलाकात डॉ. हेडगेवार से हुई। हेडगेवार उम्र में उनसे छोटे थे, लेकिन उनके विचारों से नाना साहेब गहराई से प्रभावित हुए और उनके साथ चलने का निर्णय लिया।
नाना साहेब का स्वभाव गुस्सैल माना जाता था, लेकिन बच्चों के बीच उनका व्यवहार बेहद स्नेहिल था। यही कारण रहा कि उनके घर में होने वाली शाखाओं से अनेक प्रचारक तैयार हुए। चंद्रपुर की शाखा से निकले अनेक स्वयंसेवक आगे चलकर संघ के बड़े स्तंभ बने। नाना साहेब ने वर्षों तक अपने घर को संघ कार्यकर्ताओं के ठहराव, भोजन और बैठकों के लिए उपलब्ध करवाया। यही वह वातावरण था जिसने उनके बेटे मधुकर राव को भी प्रचारक बनने की प्रेरणा दी। मधुकर राव भागवत को गुजरात भेजा गया जहां उन्होंने संघ की जड़ें जमाने का कठिन काम किया। उनका संगठन कौशल इतना प्रभावी था कि 1941 से 1948 के बीच उन्होंने गुजरात के 115 कस्बों और शहरों में शाखाएं खड़ी कर दीं। यही नहीं, उन्हें गुरु गोलवलकर ने उत्तर भारत और सिंध क्षेत्र के कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करने की जिम्मेदारी भी सौंपी थी। लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेताओं ने स्वीकार किया कि संघ जीवन की प्रारंभिक शिक्षा उन्हें मधुकर राव से मिली। आडवाणी 1984 में भी जब प्रचार के लिए नागपुर से निकले, तो वे मधुकर राव से मिलने उनके घर पहुंचे थे।
मधुकर राव का प्रभाव केवल आडवाणी तक सीमित नहीं था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपनी किताब ‘ज्योतिपुंज’ में विस्तार से लिखा कि कैसे उनका जीवन मधुकर राव से प्रभावित हुआ। मोदी 20 वर्ष की आयु में पहली बार उनसे मिले और नागपुर में प्रशिक्षण के दौरान एक माह तक उनके साथ रहे। उस समय मधुकर राव के मार्गदर्शन ने मोदी के व्यक्तित्व निर्माण पर गहरा असर डाला। यही कारण है कि गुजरात में संघ की मजबूत पकड़ का श्रेय आज भी उन्हें दिया जाता है।
हालांकि मधुकर राव का प्रचारक जीवन लगातार सक्रिय रहा, लेकिन मां के निधन के बाद पारिवारिक दबाव में उन्हें विवाह करना पड़ा। इसके बावजूद वे विवाहित प्रचारक की तरह ही संघ कार्यों से जुड़े रहे। गुजरात और चंद्रपुर, दोनों जगह उन्होंने संघ को मजबूत करने का काम किया। अपने पिता की तरह उन्होंने भी अपने बेटे मोहन भागवत को संघ जीवन के लिए प्रेरित किया। मोहन भागवत बचपन से ही शाखाओं में सक्रिय रहे और धीरे-धीरे संघ के शीर्ष तक पहुंचे।
आज जब मोहन भागवत सरसंघचालक के रूप में संगठन का नेतृत्व कर रहे हैं, तो यह स्पष्ट दिखता है कि उनके जीवन पर दादा और पिता दोनों की विरासत का गहरा असर रहा है। दादा ने हेडगेवार जैसे व्यक्तित्व का साथ देकर संघ की नींव में योगदान दिया था और पिता ने संघ को नए भूगोल में स्थापित कर उसे विस्तार दिया। इन दोनों की जीवनशैली, समर्पण और संगठन क्षमता ने मोहन भागवत को भी जीवन के प्रारंभ से ही संघ की सोच और कार्यपद्धति में ढाल दिया।
संघ के सौ वर्षों की कहानी में जहां हजारों कार्यकर्ताओं के योगदान का जिक्र होता है, वहीं कुछ परिवार ऐसे भी रहे जिन्होंने पीढ़ी दर पीढ़ी इसे अपनी जीवन साधना बना लिया। भागवत परिवार ऐसा ही एक परिवार है। संघ के संस्थापक काल से लेकर वर्तमान तक उनकी निरंतर सक्रियता और योगदान ने संगठन को एक मजबूत आधार दिया है। आज संघ जिस ऊंचाई पर खड़ा है, उसमें इस परिवार की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता।
भागवत परिवार की कहानी से यह भी समझ आता है कि संघ केवल एक संगठन नहीं है, बल्कि यह विचारधारा पीढ़ियों तक चलने वाली परंपरा है। जब किसी परिवार के दादा, पिता और पुत्र तीनों अलग-अलग कालखंड में एक ही ध्येय के लिए काम करते हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत समर्पण नहीं बल्कि एक सामाजिक आंदोलन का हिस्सा बन जाता है। यही कारण है कि आज संघ के सौ वर्ष पूरे होने पर भागवत परिवार का उल्लेख गर्व और प्रेरणा दोनों के रूप में किया जाता है।