वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार
लखनऊ। पितृपक्ष में पितरों की शांति और तृप्ति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान की परंपरा है। इसी क्रम में त्रिपिंडी श्राद्ध का भी विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसमें पिता, पितामह और प्रपितामह यानी तीन पीढ़ियों के पितरों के निमित्त तीन पिंड अर्पित किए जाते हैं। इस वर्ष पितृपक्ष 26 सितंबर से शुरू हो रहा है।
त्रिपिंडी श्राद्ध को पितृ दोष से जुड़ी मान्यताओं के निवारण के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। शास्त्रीय परंपराओं में पितरों की अप्रसन्नता को परिवार में होने वाले गृह क्लेश, कार्यों में बार-बार बाधा और आर्थिक परेशानियों से जोड़ा जाता है। कुछ मान्यताओं में लगातार दुर्घटनाओं और पारिवारिक समस्याओं को भी पितृ दोष से संबंधित माना गया है। ऐसे में पितरों की तृप्ति और शांति की कामना से त्रिपिंडी श्राद्ध किया जाता है।
तीन पीढ़ियों के लिए होता है पिंडदान :
त्रिपिंडी श्राद्ध में तीन पिंड तैयार कर अलग-अलग वेदियों पर अर्पित किए जाते हैं। विधि के दौरान पिता, पितामह और प्रपितामह के नाम तथा गोत्र का स्मरण किया जाता है। पिंड बनाने में चावल, दूध, दही, काले तिल, पंचमेवा और कुश आदि सामग्री का प्रयोग किया जाता है। चावल को दूध में पकाकर भी पिंड तैयार करने की परंपरा है।
धार्मिक विधि के अनुसार तीन वेदियां बनाकर उन पर पत्ते रखे जाते हैं और पिंड अर्पित किए जाते हैं। पिंडदान के दौरान पितरों का नाम और गोत्र स्मरण किया जाता है। अनुष्ठान पूरा होने के बाद तीनों पिंडों को एकत्र कर गाय को खिलाने की परंपरा भी बताई गई है। मान्यता है कि इस विधि से तीन पीढ़ियों के पितरों की तृप्ति और शांति के लिए प्रार्थना की जाती है। क्षेत्रीय परंपराओं और परिवार की मान्यता के अनुसार विधि में अंतर हो सकता है।