वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/अजय कुमार
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में सरकारी नौकरी के लिए अभ्यर्थियों के चरित्र एवं पूर्ववृत्त सत्यापन को लेकर उठे सवालों पर नियुक्ति विभाग ने स्थिति स्पष्ट की है। विभाग ने कहा है कि किसी अभ्यर्थी को केवल उसकी राजनीतिक विचारधारा के आधार पर सरकारी नियुक्ति के लिए अनुपयुक्त नहीं माना जाएगा। सरकार की आलोचना करना, वैचारिक असहमति रखना या शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक गतिविधियों में भाग लेना हिंसात्मक गतिविधियों के समान नहीं है।
विभाग के मुताबिक, चरित्र एवं पूर्ववृत्त सत्यापन से संबंधित प्रावधान को कुछ समाचार माध्यमों में प्रकाशित रिपोर्ट के कारण गलत तरीके से समझा जा रहा है। शासनादेश का मूल उद्देश्य राजनीतिक विचारधारा के आधार पर अभ्यर्थियों को नौकरी से वंचित करना नहीं है। इसमें ऐसे संगठनों से जुड़ाव और गतिविधियों का उल्लेख है, जिनका उद्देश्य हिंसात्मक तरीके से समाज की मौजूदा व्यवस्था को बदलना है। ऐसे मामलों में निर्धारित नियमों के अनुसार विचार किया जाएगा।
नियुक्ति विभाग ने स्पष्ट किया कि सरकारी नियुक्तियों में चरित्र एवं पूर्ववृत्त सत्यापन से संबंधित यह प्रावधान पहले के शासनादेश में भी मौजूद था। नए शासनादेश में उच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन में संबंधित प्रावधानों को एक जगह संकलित कर अधिक स्पष्ट और व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसका उद्देश्य नियमों की समझ और उनके एकरूप अनुपालन को आसान बनाना है।
विभाग के अनुसार, संबंधित नियम में 21 वर्ष की आयु प्राप्त करने के बाद सत्यापन की तारीख से पहले के तीन वर्षों के दौरान ऐसी गतिविधियों में भागीदारी का उल्लेख है। हालांकि, इस अवधि में व्यक्ति की प्रवृत्ति में सकारात्मक बदलाव के ठोस प्रमाण उपलब्ध होने की स्थिति को भी ध्यान में रखने का प्रावधान है।
विभाग ने कहा कि शासनादेश को उसके संपूर्ण पाठ और संदर्भ के साथ समझना जरूरी है। राजनीतिक असहमति और हिंसात्मक गतिविधियों को एक समान मानना उचित नहीं है। चरित्र एवं पूर्ववृत्त सत्यापन की प्रक्रिया निर्धारित मानकों के आधार पर अभ्यर्थियों की उपयुक्तता परखने के लिए है, न कि शांतिपूर्ण राजनीतिक विचारों के कारण उन्हें सरकारी नौकरी से वंचित करने के लिए।