वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/अजय कुमार
लखनऊ। प्राचीन सिक्के केवल आर्थिक लेन-देन का माध्यम नहीं रहे, बल्कि वे तत्कालीन राजनीतिक सत्ता, शासकों, धार्मिक मान्यताओं, कला, संस्कृति और व्यापारिक गतिविधियों के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक साक्ष्य भी हैं। समय के साथ मुद्रा का स्वरूप बदला है, लेकिन आर्थिक गतिविधियों में इसकी मूलभूत भूमिका आज भी बनी हुई है। यह बातें राज्य संग्रहालय के निदेशक डॉ. विनय कुमार सिंह ने कहीं।
उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्त्व निदेशालय की ओर से आयोजित ‘भारतीय मुद्राशास्त्र : परम्परा, विकास एवं विविध आयाम’ विषयक तीन दिवसीय कार्यशाला का शनिवार को समापन हो गया। अंतिम दिन कार्यक्रम की शुरुआत राष्ट्रीय एकता दिवस के अवसर पर लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर की गई। निदेशक रेनू द्विवेदी, अतिथियों, वक्ताओं और प्रतिभागियों ने सरदार पटेल को श्रद्धांजलि देने के साथ राष्ट्रीय एकता, अखंडता और सुरक्षा बनाए रखने की शपथ ली।
कार्यशाला के प्रथम सत्र में डॉ. विनय कुमार सिंह ने ‘सिक्कों का ऐतिहासिक सफर’ विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने वस्तु विनिमय प्रणाली से मुद्रा के विकास और प्राचीन सिक्कों के निर्माण में धातुओं के चयन की प्रक्रिया समझाई। साथ ही आधुनिक डिजिटल और आभासी मुद्रा व्यवस्था के बारे में भी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि सिक्कों के अध्ययन से इतिहास के कई अनछुए पहलुओं को समझा जा सकता है।
निदेशक रेनू द्विवेदी ने कहा कि ऐसे आयोजन विद्यार्थियों और शोधार्थियों को पुरातात्त्विक धरोहरों के ऐतिहासिक, आर्थिक और सांस्कृतिक महत्व से परिचित कराने में सहायक हैं। दूसरे सत्र में समापन समारोह हुआ। लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर प्रो. एसएनएन कपूर और पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. केके थपल्याल ने प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र वितरित किए। दोनों शिक्षाविदों ने मुद्राशास्त्र के अध्ययन को इतिहास और पुरातत्त्व के विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण बताया।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. मनोज कुमार यादव ने किया। इस अवसर पर प्रो. प्रशांत श्रीवास्तव, प्रो. दानिश मोइन सहित विभाग के अधिकारी और कर्मचारी मौजूद रहे। कार्यशाला में प्रतिभागियों को भारतीय मुद्राओं के इतिहास, निर्माण तकनीक और कलात्मक विशेषताओं की जानकारी मिली।