वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार
लखनऊ। राज्य संग्रहालय, लखनऊ द्वारा संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश के अंतर्गत संचालित कला अभिरूचि पाठ्यक्रम व्याख्यान श्रृंखला में शुक्रवार को ‘गुप्त कालीन कला में सांस्कृतिक चेतना’ विषय पर व्याख्यान आयोजित किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य वक्ता प्रो. शैलेन्द्र नाथ कपूर, पूर्व विभागाध्यक्ष, प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय के स्वागत के साथ हुआ। इस अवसर पर पद्मविभूषण से सम्मानित कला इतिहासकार प्रो. विद्या दहेजिया, कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क से भी उपस्थित रहीं और प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए कार्यक्रम की सराहना की।
मुख्य वक्ता प्रो. एस.एन. कपूर ने गुप्तकालीन कला को भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग बताते हुए उसके विविध आयामों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि चौथी से छठी शताब्दी के मध्य का काल कला, स्थापत्य और मूर्तिकला की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध रहा। गुप्त शासकों में चंद्रगुप्त प्रथम, समुद्रगुप्त, चंद्रगुप्त द्वितीय और कुमारगुप्त का उल्लेख करते हुए उन्होंने मंदिर स्थापत्य की विशेषताओं पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि उस समय के मंदिरों में गर्भगृह, मंडप, प्रदक्षिणा पथ और बरामदा प्रमुख अंग होते थे।
प्रो. कपूर ने गुप्त संवत की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और अभिलेखीय स्रोतों का उल्लेख करते हुए सिक्कों, आभूषणों और मूर्तियों की कलात्मक विशेषताओं को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि गुप्तकालीन कला में सांस्कृतिक चेतना और आध्यात्मिकता का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
कार्यक्रम के अंत में सहायक निदेशक डॉ. मीनाक्षी खेमका ने धन्यवाद ज्ञापित किया। इस अवसर पर संग्रहालय के अधिकारी, कर्मचारी और बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे।