– केजीएमयू में ब्रोंकोस्कोपी वर्कशॉप आयोजित
– बेसिक ब्रोंकोस्कोपी सर्टिफिकेशन कोर्स एवं हैंड्स-ऑन वर्कशॉप का सफल आयोजन
वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार
लखनऊ। इंडियन एसोसिएशन फॉर ब्रोंकोलॉजी (IAB) और किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के संयुक्त तत्वावधान में रविवार को अटल बिहारी वाजपेयी साइंटिफिक कन्वेंशन सेंटर में बेसिक ब्रोंकोस्कोपी सर्टिफिकेशन कोर्स एवं हैंड्स-ऑन वर्कशॉप का आयोजन किया गया। इस शैक्षणिक कार्यशाला में लगभग 250 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम का उद्देश्य ब्रोंकोस्कोपी से जुड़ी आधुनिक तकनीकों और प्रक्रियाओं का सैद्धांतिक व व्यावहारिक प्रशिक्षण देना रहा।
कार्यशाला में ब्रोंकोस्कोपी प्रक्रिया का लाइव एवं हैंड्स-ऑन प्रशिक्षण प्रतिभागियों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। विशेषज्ञों ने बताया कि सांस की नली को ब्रोंकस कहा जाता है तथा उसकी दूरबीन द्वारा जांच को ब्रोंकोस्कोपी कहते हैं। इस तकनीक की मदद से फेफड़ों से संबंधित गंभीर बीमारियों का सही समय पर पता लगाया जा सकता है। कार्यशाला के निदेशक इंडियन एसोसिएशन फॉर ब्रोंकोलॉजी की सचिव डॉ. अमिता नेने और केजीएमयू के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभागाध्यक्ष डॉ. सूर्यकान्त रहे। वहीं, कार्यशाला के समन्वयक डॉ. ज्योति बाजपेयी और मेदांता हॉस्पिटल के डॉ. अभिषेक टंडन रहे।
कार्यक्रम के दौरान “ब्रोंकोस्कोपिक मैनेजमेंट ऑफ हेमोप्टाइसिस” विषय पर डॉ. सूर्यकान्त का व्याख्यान विशेष रूप से सराहा गया। उन्होंने कहा कि खांसी में खून आना हमेशा टीबी का संकेत नहीं होता। फेफड़ों का कैंसर, ब्रोंकाइटिस, ब्रोंकिइक्टेसिस, निमोनिया और पोस्ट-टीबी जैसी स्थितियां भी इसके प्रमुख कारण हो सकती हैं। उन्होंने बताया कि हेमोप्टाइसिस रेस्पिरेटरी मेडिसिन की सबसे चुनौतीपूर्ण आपात स्थितियों में शामिल है और इसके सही कारणों की पहचान के लिए ब्रोंकोस्कोपी अत्यंत महत्वपूर्ण जांच साबित होती है। डॉ. सूर्यकान्त ने कहा कि कई बार लोग और कुछ चिकित्सक भी खांसी में खून आने को सीधे टीबी से जोड़ देते हैं, जबकि समय रहते सही जांच न होने पर मरीज की स्थिति गंभीर हो सकती है। उन्होंने ब्रोंकोस्कोपी की उपयोगिता को जीवन रक्षक बताते हुए इसके व्यापक उपयोग पर जोर दिया।
कार्यशाला में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, डॉ. के.बी. गुप्ता, डॉ. एस.एन. गुप्ता, डॉ. अजय वर्मा, डॉ. आनंद गुप्ता, डॉ. अशोक कुमार सिंह, डॉ. अनिल कुमार सिंह, डॉ. हूडा शमीम और डॉ. रचित शर्मा सहित कई वरिष्ठ पल्मोनोलॉजिस्ट मौजूद रहे। कार्यक्रम का समापन पल्मोनरी मेडिसिन में प्रशिक्षण और अकादमिक सहयोग को बढ़ावा देने के संकल्प के साथ हुआ।