लखनऊ। एसआईआर की ड्राफ्ट मतदाता सूची के आंकड़ों को देखें तो इसका सीधा और तात्कालिक फायदा या नुकसान किसी एक पार्टी को घोषित करना आसान नहीं है, लेकिन रुझान के आधार पर राजनीतिक असर समझा जा सकता है।
सबसे अधिक वोट कटौती शहरी जिलों जैसे लखनऊ, गाजियाबाद, नोएडा, प्रयागराज, कानपुर और वाराणसी में हुई है। इन इलाकों में अब तक भाजपा का मजबूत संगठन और वोट बेस माना जाता रहा है। शहरी मध्यवर्ग, नौकरीपेशा, व्यापारी और प्रवासी मतदाता बड़ी संख्या में भाजपा के पक्ष में वोट करते रहे हैं। एसआईआर के कारण अगर बड़ी संख्या में ऐसे वोटर अपने पैतृक गांव या दूसरे जिलों में शिफ्ट हो गए हैं, तो शहरी सीटों पर भाजपा को नुकसान होने की संभावना अधिक मानी जा रही है। खासतौर पर नगर निगम, विधानसभा और लोकसभा सीटों पर इसका असर दिख सकता है।
वहीं दूसरी ओर ग्रामीण और अर्ध-ग्रामीण क्षेत्रों में मतदाता संख्या का संतुलन बढ़ने से समाजवादी पार्टी और कुछ हद तक कांग्रेस को फायदा मिल सकता है। सपा का पारंपरिक आधार गांव, कस्बे, किसान और स्थानीय मतदाताओं में मजबूत रहा है। अगर शहरी क्षेत्रों से वोट कटकर ग्रामीण क्षेत्रों में जुड़े हैं, तो यह सपा के लिए सकारात्मक संकेत हो सकता है। खासकर पूर्वांचल और मध्य यूपी में सपा को इसका लाभ मिल सकता है।
बसपा के लिए स्थिति थोड़ी अलग है। उसका कोर वोट बैंक शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में फैला हुआ है, लेकिन पिछले कुछ चुनावों में उसका संगठन कमजोर पड़ा है। यदि मतदाता सूची में शुद्धता बढ़ती है और डुप्लीकेट व फर्जी नाम हटते हैं, तो बसपा को सीमित लेकिन स्थिर लाभ मिल सकता है, बशर्ते पार्टी संगठनात्मक रूप से सक्रिय हो।
कुल मिलाकर, शहरी इलाकों में भारी वोट कटौती भाजपा के लिए चेतावनी मानी जा रही है, जबकि ग्रामीण झुकाव बढ़ने से सपा को अपेक्षाकृत लाभ की संभावना है। हालांकि अंतिम असर इस बात पर निर्भर करेगा कि दावा-आपत्तियों के बाद कितने वोटर वापस जुड़ते हैं और पार्टियां जमीन पर मतदाताओं को कितनी प्रभावी ढंग से mobilize कर पाती हैं। अंतिम सूची आने के बाद ही तस्वीर पूरी तरह साफ होगी।
अगर ज़िलों का अध्ययन करे तो हम देखते है की सबसे अधिक असर राजधानी लखनऊ में देखने को मिला है, जहां 30.05 प्रतिशत मतदाताओं के नाम सूची से हट गए हैं। पहले लखनऊ में 39.94 लाख मतदाता थे, जो अब घटकर 27.94 लाख रह गए हैं। यानी करीब 12 लाख वोटरों के नाम कटे हैं। एसआईआर के दौरान पहली बार बड़ी संख्या में लोगों ने शहर की बजाय अपने पैतृक निवास स्थान को प्राथमिकता दी, जिसका सीधा असर शहरी जिलों की मतदाता सूची पर पड़ा है।
लखनऊ के बाद गाजियाबाद दूसरे स्थान पर है, जहां 28.83 प्रतिशत वोट कटे हैं। यहां पहले 28 लाख मतदाता थे, जो अब घटकर करीब 20 लाख रह गए हैं। 25.98 प्रतिशत के साथ बलरामपुर तीसरे नंबर पर है, जहां चार लाख से अधिक मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट सूची से हटे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एसआईआर की यह ड्राफ्ट सूची आने वाले चुनावों में प्रदेश की सियासी दिशा बदलने के संकेत दे रही है। ड्राफ्ट सूची जारी होने के बाद प्रदेश के पांच प्रमुख धार्मिक जिलों अयोध्या, वाराणसी, मथुरा, प्रयागराज और गोरखपुर पर सबसे ज्यादा नजर रही। इन जिलों में सबसे अधिक 24.64 प्रतिशत वोट प्रयागराज में कटे हैं। प्रयागराज में पहले 46.92 लाख मतदाता थे, जो अब घटकर 35.36 लाख रह गए हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में यहां एनडीए ने आठ सीटों पर जीत दर्ज की थी, जबकि चार सीटें सपा के खाते में गई थीं। हालांकि लोकसभा चुनाव में भाजपा को यहां हार का सामना करना पड़ा था। मथुरा में 19.20 प्रतिशत, वाराणसी में 18.18 प्रतिशत और अयोध्या में 17.69 प्रतिशत मतदाता कम हुए हैं। गोरखपुर में भी करीब 17.61 प्रतिशत वोट घटे हैं। गोरखपुर शहर सीट से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ विधायक हैं और 2022 के विधानसभा चुनाव में यहां भाजपा ने क्लीन स्वीप किया था।
लखनऊ, प्रयागराज, आगरा, नोएडा, कानपुर, बरेली और गाजियाबाद जैसे शहरी जिलों में मतदाताओं की संख्या में आई गिरावट को अहम माना जा रहा है। इन क्षेत्रों में अब तक भाजपा का मजबूत आधार रहा है। ऐसे में मतदाताओं की संख्या घटने का सबसे ज्यादा प्रभाव सत्तारूढ़ दल पर पड़ने की संभावना जताई जा रही है।
यूपी के 5 मुस्लिम बहुल जिले सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, मुरादाबाद, रामपुर, संभल में मुस्लिम मतदाता 40 से 50% तक हैं। इन जिलों में 20% तक वोटर कम हुए हैं। इन जिलों में विधानसभा की 28 सीटें हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में इसमें 11 सीटों पर एनडीए जीता था। बाकी 17 सीटों पर सपा गठबंधन को बढ़त मिली थी। हालांकि चुनाव बाद रालोद भाजपा के साथ आ चुका है।
मुरादाबाद की 6 विधानसभा सीटों में 3,87,628 (15.76%) वोटर कम हुए हैं। सहारनपुर की 7 सीटों में 4,32,539 (16.37%) वोटर कम हुए हैं।
मुजफ्फरनगर में 6 सीटों में 3,44,222 (16.29%) वोटर कम हुए। रामपुर की 5 सीटों में 3,21,572 (18.29%) वोटर कम हुए हैं। संभल की 4 सीटों में 3,18,615 (18.29%) वोटर कम हुए हैं।

अजय कुमार “काशी रत्न”