वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)
लखनऊ। “जग कहता कागज की लेखी मैं कहता अंखियन की देखी।” कबीर दास की यह पंक्ति डॉक्टर उदित नारायण पांडेय के कहानी संग्रह समझावनपुर पर पूरी तरह से चरितार्थ होती है। परिवहन विभाग में एक अधिकारी के रूप में ड्यूटी करते समय लेखक ने सड़कों पर होने वाली दुर्घटनाओं को बहुत ही नजदीकी से देखा है। उनके लिए सड़क दुर्घटना केवल आंकड़े नहीं रहे हैं बल्कि दुर्घटना में मृत किसी के बेटे को उन्होंने एक पिता के रूप में महसूस किया है। सड़क दुर्घटना के कारण अंग-भंग हुई व्यक्ति एवं परिवार की पीड़ाओं ने उनके अंतर्मन को कई बार झकझोरा है एवं दुर्घटनाओं की मार्मिक आवाज उनके हृदय तक पहुंची है।अधिकारी से बढ़कर मानवीय भावों से भरे हुए आम जनमानस के रूप में लेखक ने सड़क की मौतें ,दुर्घटना रक्तपात, चीख और चीत्कार को न सिर्फ देखा बल्कि महसूस किया है।
‘रफ्तार’ कहानी में उल्लिखित तेज रफ्तार से चलती हुई बाइक के कारण विकलांग हुए शिवम की घटना केवल एक सूचना के रूप में नहीं बल्कि यह किसी बच्चे के उन्नति और प्रगति की भी विकलांगता के रूप में लेखक ने महसूस किया है। लेखक की सड़क दुर्घटना के संदर्भ में संवेदनशीलता मानव मात्र तक सीमित नहीं है बल्कि इससे आगे बढ़कर यह सभी प्राणियों के लिए है। ‘कपिला’ कहानी इसका मूर्तिमान रूप है जिसमें मानव द्वारा गायों को दुह लेने के पश्चात उन्हें आवारा छोड़ देने के कारण होने वाली दुर्घटनाओं का जीवंत चित्रण किया गया है।
इस रूप में समझावनपुर की कहानियों में महर्षि आदि कवि वाल्मीकि परंपरा ध्वनित होती है जिसमें बहेलिया द्वारा क्रौंच युगल में से एक का वध कर दिए जाने से बिलखते हुए उसके सहचरी को देखकर महर्षि वाल्मीकि के मुंह से सहसा कविता फूट पड़ी थी। ठीक इसी प्रकार समझावनपुर की दसों कहानियां, रफ्तार, शनि निवारण, नशा, अपराजिता, कपिला, फेरे, समझावानपुर ,फूल और माली ,फक्कड़ चाचा सभी ऐसी ही सड़क दुर्घटना की कराह और आह से निकली हुई हैं।
वियोगी होगा पहले कवि आह से उपजा होगा गान,
उमड़कर आंखों से चुपचाप बही होगी कविता अनजान।
स्पष्ट है कि समझावनपुर की कहानियां काल्पनिक घटनाओं पर आधारित न होकर लेखक की गहन अनुभूति और संवेदनाओं से नि:सृत सड़क दुर्घटनाओं की कठोर वास्तविकता को प्रतिबिंबित करती हैं। ‘साहित्य समाज का दर्पण होता है’ साहित्य की कसौटी के रूप में भी समझावनपुर की कहानियों में सड़क और उससे जुड़े हुए सारे आयाम प्रत्येक पात्र और प्रत्येक घटना में प्रतिबिंबित होते रहतेहैं।
साहित्य शास्त्रियों के अनुसार जिसमें हित का भाव हो, जिसमें लोक मंगल का भाव हो वही साहित्य है, ‘हितेन सहितं साहित्यम्’। यही साहित्य की कसौटी भी है और यही साहित्य का उद्देश्य भी है। इस रूप में लेखक ने कहानियों के माध्यम से आम जनमानस को सड़क सुरक्षा के नियमों से प्रशिक्षित करने, उन्हें जागरूक करने का कार्य बहुत ही सरल किंतु सशक्त ढंग से किया है। जो भी सुधी पाठक इन कहानियों से होकर गुजरता है उसे कहानी के पात्र सहज ही यह दिशा देते हैं कि किसी भी पिता को अपने अल्पवयस्क लाडले को कभी भी कोई बाइक नहीं देनी चाहिए। यदि हम नशे में वाहन का चालन करते हैं तो हमारा विनाश सुनिश्चित है। थोड़ी सी भी लालच में पड़कर ओवरलोडिंग करते हैं, सुरक्षा के नियमों की उपेक्षा करते हैं तो इसके दुष्परिणाम अवश्य भुगतने होंगे। सड़क सुरक्षा से संबंधित नियमों विधानों की जानकारी तब और आवश्यक हो जाती है जब हमारे देश मे प्रति 3 मिनट में एक व्यक्ति सड़क दुर्घटना के कारण काल कवलित हो जाता है। इस रूप में किसी भी व्यक्ति के हित का सबसे बड़ा साधन जान- माल की रक्षा है। सड़क सुरक्षा इसमें अहम भूमिका अदा करती है। लेखक की कहानियां सड़क सुरक्षा से जुड़े सभी पहलुओं को बहुत ही सशक्त रूप में पाठक के अंदर बैठाने में सक्षम है। लेखक द्वारा ‘कहानी के अंदर कहानी’ की शैली द्वारा इसे और बोधगम्य तथा मनोरंजक बनाने का प्रयास किया गया है । इससे कोई भी पाठक कहानी को पढ़ते समय बिना रुके, बिना थके , स्वाभाविक रूप में आगे बढ़ता जाता है। कहानी के अंदर कहानी की माला का यह जोड़ यहां बेजोड़ है।
लेखक की इस विशिष्ट शैली ने समझावनपुर कहानियों को ‘यथा नाम तथा गुण’ के रूप में चरितार्थ किया है। सभी कहानियां-
“रिटेक केवल फिल्मों में होता है।”
“तेज गति करे दुर्गति “
“सिर सलामत तो सब सलामत “
जैसे सड़क सुरक्षा से संबंधित पहलुओं को शानदार ढंग से समझाने में सफल सिद्ध होती हैं!
जो भी व्यक्ति समझावनपुर की कहानियों को पढ़ेगा निश्चित रूप से जब वह सड़क पर चलेगा तो उसके साथ-साथ में समझावनपुर की कहानियां भी चलती रहेंगी। इस रूप में समझावनपुर की कहानियां अदृश्य सारथी के रूप में व्यक्ति के जीवन रथ को सड़क पर सही और सुरक्षित रास्ता दिखाती रहेंगी। आजकल केवल मनोरंजक साहित्य की भरमार देखी जा रही है जो केवल हमारी तंत्रिकाओं को गुदगुदाते हैं किंतु उचित उपदेश के मर्म से वंचित रहते हैं।ऐसे में लेखक द्वारा समझावनपुर कहानियों के माध्यम से सड़क सुरक्षा से संबंधित सभी पहलुओं को समझाया गया है। इस रूप में साहित्य की कसौटी पर समझावनपुर की कहानियां पूरी तरह से खरी उतरती हैं। जैसा कि राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने कहा भी है ,
केवल मनोरंजन ही नहीं कवि का कर्म होना चाहिए।
उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए।
सभी कहानियां साहित्य के उपदेशपरक मूल्य को लेकर आगे बढ़ती हैं। इन कहानियों में सड़क से जुड़े हुए जितने भी पहलू हैं, सभी से संबंधित जागरूकता से युक्त उपदेशों का समावेश है किंतु ये उपदेश गुरु या धर्माचार्य की शैली में आदेशपरक नहीं है न ही मित्र की शैली में परामर्शपरक हैं। ये तो साहित्यशास्त्रियों और साहित्यमर्मज्ञों द्वारा निर्धारित साहित्य की कसौटी के अनुसार कान्तापरक शैली में हैं। इस रूप में जैसे ही पाठक इन कहानियों के ‘सड़क’ पर चलने लगता है वैसे ही , सड़क से संबंधित नियम ,कानून , तौर-तरीके सब उसे मालूम होने लगते हैं। यही नहीं इनका उल्लंघन करने पर विकलांगता, दुर्घटना, मृत्यु, जान -माल की क्षति, परिवार के कुलदीप का बुझ जाना सबका बोध पाठक को होने लगता है। ये बोध, आंकड़े तथ्य विकिपीडिया, गूगल, या फिर परिवहन विभाग की वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों जैसे नहीं है। मस्तिष्क को छूने वाले उपर्युक्त माध्यमों से सर्वथा विशिष्ट सड़क से संबंधित सभी पहलू समझावनपुर कहानियों के माध्यम से हृदय में अंकित हो जाने वाले हैं।
समझावनपुर कहानी के सभी पात्र कभी इकलौते लाडले पुत्र ‘राज ‘के रूप में, तो कभी घर को विज्ञान की रोशनी से रोशन करने वाली तथा अंधविश्वास का शमन करने वाली बेटी ‘दीपिका’ के रूप में, कभी अतिशय लाड़ प्यार में अपने अल्पवयस्क बेटे को बाइक के साथ-साथ उसके दुर्भाग्य की चाभी पकड़ाने वाले मां-बाप के रूप में, तो कभी अपना सब कुछ खोकर जगने वाले ‘फक्कड़ चाचा’ के रूप में सड़क के कायदे और कानून पाठक के हृदय में बैठते जाते हैं।
समझावनपुर कहानी अपने नाम को इसलिए भी चरितार्थ करती है क्योंकि यहां केवल एक व्यक्ति, यह एक संस्था या एक परिवार ही सड़क -सुरक्षा से संबंधित नियमों को समझता और समझाता नहीं है बल्कि पूरा का पूरा ‘पुर’ इसे समझता और समझाता है। समझने वाले और समझाने वालों में पति भी है, पत्नी भी है, पिता भी है,दादा भी हैं, माता भी है, पुत्र भी है ,पुत्री भी है, बहन भी है, मित्र भी हैं, डॉक्टर भी हैं, पुलिस भी हैं, ढोंग और अंधविश्वास के द्वारा अपनी दुकान चलाने वाले बंजारा बाबा भी हैं और अंधविश्वास की जमीन पर फलती- फूलती खेती को तर्क से बंजर करने वाली बिटिया दीपिका भी है, घायल भी हैं ,जीवित भी हैं, यहां तक की मृत भी हैं। इस रूप में समझावनपुर की सभी दस कहानियां ऐसा लगता है की दसों दिशाओं में ‘सड़क सुरक्षा ‘के मंत्र को गुंजायमान कर रही हैं।
प्रत्येक कहानी के प्रत्येक पात्र में,प्रत्येक घटना में, सड़क सुरक्षा की संजीवनी जीवन्त है। हर कहानी संग्रह का शीर्षक कहानी के मूल और मूल्य को एक शब्द में ही स्पष्ट कर देता है। ‘रफ्तार’ कहानी बताती है की बाइक रफ्तार यदि अनियंत्रित हुई तो किसी के जीवन की रफ्तार को विकलांगता के रूप में धीमी कर देती है। ‘शनिनिवारण ‘कहानी में बहुत ही सही तरीके से यह स्पष्ट किया गया है की दुर्घटना का कारण शनि का प्रकोप नहीं बल्कि परिवहन के नियमों से दूरी है। ‘नशा’ कहानी मार्मिक चित्रण के द्वारा यह स्पष्ट करती है कि नशे में हम केवल शराब नहीं पीते बल्कि नशा पीकर गाड़ी चलाने से पता नहीं कितने लोगों की जिंदगियां भी ‘पी’ जाते हैं। उनमें उस डॉक्टर के इकलौती बेटी की जिंदगी भी हो सकती है जिसने दुर्घटनाग्रस्त नशेड़ियों की जान बचाई हो। इस रूप में यह कहानी न केवल नशा मुक्ति आंदोलन का रूप लेती है बल्कि यह भी दिल में बैठा देती है की नशा से युक्त होकर गाड़ी चलाना सीधे अपनी गाड़ी को यमराज का वाहन बना देना है। इस कहानी में लेखक के पात्र ऐसा लगता है की महात्मा गांधी का रूप धारण कर लेते हैं जो नशा मुक्ति आंदोलन को नए स्वरूप में आधुनिक संदर्भ में संचालित कर रहे हैं।
यद्यपि सभी कहानियों का अपना मूल्य है ।सभी अपना -अपना संदेश अपने ढंग से देती हैं किन्तु ‘अपराजिता’ कहानी का मूल्य और संदेश सबसे विशिष्ट है। जैसे भारतीय संस्कृति में कन्या सबसे गुणी वर का चयन करती थी। सीता स्वयंवर की कथा हम सब जानते हैं सीता द्वारा राम को वर माला उनके गुणों के आधार पर पहनाई गई। यहां पर अपराजिता जैसी सुयोग्य पुत्री पति के चयन में सबसे बड़े गुण और सबसे बड़ी कसौटी के रूप में यातायात से संबंधित नियमों के अनुपालन को रखती है। उसकी यह कसौटी तब और खरी उतरती है जब सुरक्षा के नियमों को न मानने वाले कमाऊ और सुन्दर लड़के ईशान को अपने जीवनसाथी के रूप में चुनने से मना कर देती है और वही लड़का यातायात के नियमों की उल्लंघन के कारण काल का ग्रास बन जाता है। इस कहानी का यह मूल्य पाठकों को निश्चित रूप से झंकृत करेगा। हमें नहीं लगता कि अभी तक के किसी भी साहित्य में इस प्रकार का विशिष्ट और अद्भुत संदेश किसी भी कहानीकार, कवि, लेखक या उपन्यासकार द्वारा के द्वारा दिया गया है। इस रूप में यह कहानी अनुपम है। इस मूल्य की स्थापना के लिए लेखक की जितनी प्रशंसा की जाए उतनी कम है क्योंकि चाहे जितने भी गुण हों , जितनी भी संपत्ति का स्वामी हो, जितना भी ताकतवर हो, जितना भी उद्भट विद्वान हो यदि वह सुरक्षा नियमों का उल्लंघन करेगा , तो सब कुछ इसी धरा पर ‘धरा’ रह जाएगा और वह स्वर्ग सिधार जाएगा।
‘कपिला’ कहानी न केवल छुट्टा पशुओं की समस्या को उजागर करती है बल्कि मानव के उस स्वार्थी स्वरूप को ,भी सामने लाती है जिसमें वह गाय का दूध दुहने के बाद उसे उसकी हालात पर छोड़ देता है और अंततः वह दुर्घटना का कारण बनती है और स्वयं भी दुर्घटनाग्रस्त हो जाती है। इस प्रकार यह कहानी बेजुबान के दर्द को मर्मस्पर्शी रूप में सामने रखती है। यहां पर भारतीय संविधान के मूल कर्तव्यों तथा नीति निर्देशक तत्त्वों में निहित गोरक्षा को भी प्रभावी रूप में उकेरा गया है।
‘फेरे ‘कहानी तीन दोस्तों की कहानी है। इस कहानी में खलासी भी है, ड्राइवर भी है, ट्रक भी है, लालच भी है तथा सीधे रास्ते पर चलने वाला संतोषी परविंदर भी है। इस कहानी को पढ़ते समय पाठक के सामने भारतीय सड़कों पर हर्र -हर्र और पों -पों के रूप में आर्तनाद करते हुए , ओवरलोडेड ट्रकों की तस्वीर सामने घूमने लगती है। जब कभी पाठक सड़कों पर जाता है और ऐसी ट्रकों को देखता है तो यही फेरे कहानी उसके दिल और दिमाग में ‘फिरने ‘ लगती है।
इसीप्रकार समझावनपुर कहानी का मुख्य पात्र उदय बारीकी से यह समझाने में सफल रहती है कि’ ट्रैक्टर ट्राली’ सवारी नहीं बोझा ढोने के लिए बनी होती है। ‘फूल और माली’ की कहानी उस मर्म को उजागर करती है कि यदि माली कलियों को ही तोड़ने लगे तो वह फूल नहीं बन सकते। ठीक इसी प्रकार से हर मां -बाप का माली के रूप में कर्तव्य है कि वह फूल जैसे बच्चों को समय से पहले गाड़ियां ना दे नहीं तो वे खिलने से पहले ही मुरझा जाएंगे।
‘ फक्कड़ चाचा ‘ कहानी का नाम और शीर्षक सर्वाधिक प्रभावित करता है। ‘कुछ तो बात रही होगी कोई यूं ही फक्कड़ नहीं बनता।’इस रूप में फक्कड़ चाचा के साथ कुछ बात यही थी कि वह जब सड़क पर चलते थे तो केवल और केवल खुद को देखते थे ,खुद की गाड़ी को देखते थे, इसके अलावा चाहे कोई सड़क पर मर रहा हो ,जी रहा हो , सड़क दुर्घटना के कारण कराह हो, खून से लथपथ हो कुछ भी नहीं देखते थे। उनकी यह अनदेखी खुद उनके सामने आकर खड़ी हो जाती है। जब किसी दुर्घटना में उनके अलावा उनके परिवार के सारे सदस्य घायल हो जाते हैं उन्हें भी नहीं देखा जाता न ही समय से अस्पताल पहुंचाया जाता और इस रूप में ‘कुछ न देखने ‘वाले फक्कड़ चाचा का ‘सब कुछ’ समाप्त हो जाता है। इसके पश्चात फक्कड़ चाचा की आंख खुलती है और वे सड़क पर घायल हुए लोगों की जान बचाने के लिए मशाल का काम करने लगते हैं।लेखक ने यहां पर ‘जैसी करनी वैसी भरनी’ के मूल्य को तथा इसके पश्चात होने वाले हृदय परिवर्तन को फक्कड़ चाचा की कहानी के माध्यम से हृदय स्पर्शी रूप में स्थापित किया है। इसी के साथ घायलों के इलाज से संबंधित परिवहन विभाग की ‘राहवीर ‘ योजना को को भी लेखक द्वारा सहज ढंग से रख दिया गया है।
इस रूप में समझावनपुर की कहानियां अपनी रचना शैली, अपने कथ्य अपने तथ्य और अपने उद्देश्य सभी दृष्टियों से लेकर विशिष्ट हैं। भारत ही नहीं विश्व का हर व्यक्ति सड़क से होकर गुजरता है। सड़कें उसके जीवन की धमनियां हैं। कोई भी पाठक यदि समझावनपुर कहानियों को पढे़गा ,इसमें निहित मूल्यों को समझेगा तो निश्चित रूप से वह स्वयं की रक्षा करेगा, औरों की रक्षा करेगा , सुरक्षा कानून की रक्षा करेगा। इस रूप में समझावनपुर की कहानियां संक्षेप में सड़क हादसे और जीवन मूल्यों के अन्तराल को भी जोड़ने मे बेजोड़ है। उत्तर प्रदेश सरकार एवं भारत सरकार के परिवहन विभाग को निश्चित रूप से इन्हें प्रचारित प्रसारित करना चाहिए। समझावनपुर की कहानियां पढ़ी और पढ़ाई जानी चाहिए जिससे कोई अल्प वयस्क विद्यार्थी अपने घर में बाइक चलाने की जिद ना करें जिससे उसकी जिंदगी के पहिए निर्बाध गति से चलते रहें। लेखक ने इसके पूर्व ‘जागो रे जागो’ कविता संग्रह की कविताओं के माध्यम से , गीतों के माध्यम से यातायात के नियमों और सड़क सुरक्षा से संबंधित आयामों को रखा है। जो ‘यत्र-तत्र- सर्वत्र’ प्रशंसित हुए हैं। समझावनपुर कहानियां लेखक की इसी निरंतर गति करती हुई ,प्रगति करती हुई प्रज्ञा को नित नए आयामों और संदर्भ में प्रस्तुत कर रहे हैं।
लेखक :
डा सी० एल० त्रिपाठी ,
राजकीय अधिकारी, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश।