लखनऊ। यूपी की कुर्मी बहुल करीब 40 विधानसभा सीटों पर अपना दल (कमेरावादी) की नेता पल्लवी पटेल की सक्रियता ने सियासी हलचल बढ़ा दी है। अखिलेश यादव से गठबंधन टूटने के बाद यदि पल्लवी पटेल इन सीटों पर अकेले मैदान में उतरती हैं, तो इसका सीधा असर भाजपा और सपा दोनों पर पड़ सकता है।
बताते चलें कि कुर्मी वोट बैंक पूर्वी यूपी, बुंदेलखंड और मध्य यूपी की कई सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाता है। अब तक यह वोट बड़े पैमाने पर भाजपा और कुछ हद तक सपा में बंटा रहा है। पल्लवी पटेल का फोकस इसी सामाजिक आधार पर है। अगर वह कुर्मी मतदाताओं को संगठित करने में सफल होती हैं, तो भाजपा के परंपरागत कुर्मी वोट में सेंध लग सकती है, क्योंकि अनुप्रिया पटेल के जरिए भाजपा अब तक इस वर्ग को साधती रही है।
वहीं समाजवादी पार्टी को भी नुकसान की आशंका है। 2022 और 2024 में सपा को कुर्मी समाज का आंशिक समर्थन मिला था, खासकर उन सीटों पर जहां यादव-मुस्लिम समीकरण के साथ कुर्मी वोट जुड़ा था। पल्लवी पटेल के अलग होने से सपा का यह समीकरण कमजोर पड़ सकता है और वोटों का विभाजन होगा। हालांकि, पल्लवी पटेल के लिए चुनौती संगठन और संसाधनों की है। अकेले लड़ने की स्थिति में उनकी पार्टी जीत भले कम हासिल करे, लेकिन 40 सीटों पर 3 से 8 प्रतिशत वोट भी काट लेती है तो कई सीटों पर हार-जीत का अंतर तय कर सकती है। कुल मिलाकर, पल्लवी पटेल की रणनीति सीधे तौर पर सत्ता समीकरण बदलने से ज्यादा भाजपा और सपा दोनों के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है और त्रिकोणीय मुकाबले को हवा दे सकती है।
हांलाकि पल्लवी पटेल के हालिया दो बयान सियासी हलकों में काफी चर्चा में रहे है। पहला बयान 19 दिसंबर को भाजपा के नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी को लेकर था। उनसे सवाल पूछा गया था कि कुर्मी समाज पर पंकज चौधरी की नियुक्ति का क्या असर पड़ेगा?
इस पर पल्लवी ने कहा था- बुजुर्ग कहते हैं कि शिकारी तालाब से मछली पकड़ने के लिए कांटे में मांस का लोथड़े लगाता है। बस इतना ही कहूंगी।
दूसरा बयान सपा प्रमुख अखिलेश यादव को लेकर पल्लवी ने कहा था कि मैं पटेल हूं, पल्लवी पटेल। धोखा, छल-छलावा हमारे संस्कारों में नहीं है। समाजवादी पार्टी और अखिलेश जी से हमारे राजनीतिक ही नहीं, निजी संबंध भी हैं। वे मेरे बड़े भाई जैसे हैं। मैं हमेशा उनकी छोटी बहन बनकर ही रही हूं। मेरी मर्यादा है, जिसका उल्लंघन मैं नहीं कर सकती।

अजय कुमार “काशी रत्न”