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2047 से पहले का आत्मपरीक्षण- उपलब्धि, चुनौती और चेतना : डॉ. विनय कुमार वर्मा

वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार
भारत आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ पीछे मुड़कर देखने पर एक गौरवशाली अतीत दिखाई देता है और आगे देखने पर संभावनाओं से भरा भविष्य। बीच में खड़ा यह वर्तमान समय हमसे केवल उत्सव नहीं, बल्कि ईमानदार आत्मपरीक्षण की माँग करता है। चारों ओर विकास की बातें हैं- सड़कें बन रही हैं, इमारतें ऊँची हो रही हैं, डिजिटल सेवाएँ तेज़ हुई हैं, अंतरिक्ष में झंडा लहराया गया है और दुनिया भारत को “उभरती शक्ति” कह रही है। पर प्रश्न यह नहीं है कि भारत आगे बढ़ रहा है या नहीं; प्रश्न यह है कि क्या हम उतनी तेज़ी से बढ़ रहे हैं, जितनी तेज़ी से बढ़ना इस सदी में आवश्यक है? और उससे भी बड़ा प्रश्न- क्या हमारी दिशा वही है, जो हमें 2047 में सचमुच विकसित राष्ट्र बना सके?
विकास को अक्सर हम दृश्य उपलब्धियों से मापने लगते हैं- कितनी सड़कें बनीं, कितने मोबाइल कनेक्शन बढ़े, कितनी योजनाएँ शुरू हुईं। ये सब आवश्यक हैं, पर ये विकास का बाहरी ढाँचा हैं, उसकी आत्मा नहीं। विकास की आत्मा वहाँ बसती है जहाँ शिक्षा गहरी हो, जहाँ वैज्ञानिक दृष्टिकोण समाज के सामान्य व्यवहार में उतर चुका हो, जहाँ शोध और नवाचार केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित न हों, बल्कि खेत, फैक्ट्री, अस्पताल और बाज़ार तक पहुँचें। जब हम चीन, जापान, दक्षिण कोरिया या अमेरिका की ओर देखते हैं, तो उनके विकास की चमक हमें आकर्षित करती है, पर उसकी जड़ें हमें असहज करती हैं- क्योंकि वहाँ मेहनत लंबी, अनुशासन कठोर और प्राथमिकताएँ स्पष्ट रही हैं।
चीन हमारा सबसे निकटतम उदाहरण है- भौगोलिक रूप से भी और ऐतिहासिक रूप से भी। कुछ दशक पहले तक वह भी एक विशाल जनसंख्या, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सीमित संसाधनों वाला देश था। पर उसने यह स्वीकार किया कि भावनाओं से नहीं, रणनीति से राष्ट्र बनते हैं। उसने शिक्षा को केवल डिग्री का माध्यम नहीं बनाया, बल्कि उसे उत्पादन, तकनीक और अनुसंधान से जोड़ा। वहाँ विश्वविद्यालय केवल पढ़ाने की जगह नहीं हैं, बल्कि उद्योग के सहयोगी हैं। वहाँ शोध पत्र केवल अकादमिक अंक नहीं बढ़ाते, बल्कि पेटेंट, उत्पाद और निर्यात बनते हैं। यही कारण है कि आज कृषि से लेकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक, रक्षा से लेकर स्वास्थ्य तक- चीन हर क्षेत्र में नए कीर्तिमान गढ़ रहा है।
भारत भी पीछे नहीं है, यह कहना गलत होगा। हमारे पास प्रतिभा की कमी नहीं, बुद्धिमत्ता की कमी नहीं, कल्पनाशीलता की भी कमी नहीं। पर समस्या यह है कि हमारी प्रतिभा अक्सर व्यवस्था से टकरा जाती है, हमारी बुद्धिमत्ता अवसर की प्रतीक्षा में थक जाती है और हमारी कल्पनाशीलता पर परीक्षा- प्रणाली का बोझ पड़ जाता है। हम बच्चों को बचपन से ही उत्तर देना सिखाते हैं, प्रश्न पूछना नहीं। हम उन्हें अंक लाने की दौड़ में दौड़ाते हैं, खोज करने की यात्रा पर नहीं भेजते। जब तक शिक्षा स्मृति- प्रधान रहेगी और शोध हाशिये पर रहेगा, तब तक विकास की गति स्वाभाविक रूप से मध्यम ही रहेगी।
जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों का उदाहरण बताता है कि संसाधनों की कमी विकास में बाधा नहीं होती, यदि मानव संसाधन को राष्ट्र की सबसे बड़ी पूँजी माना जाए। वहाँ शिक्षक केवल नौकरी नहीं करता, वह राष्ट्र- निर्माण की जिम्मेदारी निभाता है। वहाँ छात्र केवल परीक्षार्थी नहीं होता, वह संभावित नवोन्मेषक माना जाता है। वहाँ असफलता को कलंक नहीं, सीख की सीढ़ी समझा जाता है। इसके विपरीत हमारे यहाँ असफलता को भय बना दिया गया है- डर कि अंक कम आए तो भविष्य बंद हो जाएगा, डर कि प्रश्न पूछ लिया तो अनुशासन टूट जाएगा।
अमेरिका की शक्ति केवल उसके बजट में नहीं, बल्कि उसकी सोच की स्वतंत्रता में है। वहाँ विचार करने की आज़ादी है, प्रयोग करने की छूट है और विफल होने का अधिकार है। यही कारण है कि वहाँ स्टार्टअप संस्कृति पनपी, तकनीकी क्रांति हुई और शोध को सामाजिक सम्मान मिला। भारत में भी स्टार्टअप बढ़ रहे हैं, पर अधिकांश नवाचार अभी भी सेवा- आधारित हैं, मौलिक तकनीक-निर्माण में हमारी हिस्सेदारी सीमित है। जब तक हम उपभोक्ता से निर्माता बनने की मानसिकता नहीं अपनाएँगे, तब तक हम वैश्विक नेतृत्व की बात केवल भाषणों में ही कर पाएँगे।
हमारा सांस्कृतिक पक्ष अत्यंत समृद्ध है- इसमें कोई संदेह नहीं। हमारे इतिहास ने हमें आत्मविश्वास दिया है, हमारी परंपराओं ने हमें पहचान दी है। पर संस्कृति तब जीवंत रहती है जब वह समय से संवाद करती है, न कि केवल अतीत का स्मरण बनकर रह जाती है। विश्वगुरु बनने का अर्थ यह नहीं कि हम बार- बार वही कहें कि हम कभी महान थे; विश्वगुरु बनने का अर्थ है कि आज की समस्याओं का समाधान देने की क्षमता हमारे पास हो। केवल संस्कृति को ढोने से नहीं, उसे नवचेतना से जोड़ने से नेतृत्व मिलता है।
सरकार ने 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का लक्ष्य रखा है। लक्ष्य महत्त्वपूर्ण है, पर लक्ष्य तभी सार्थक होता है जब उसके साथ स्पष्ट रोडमैप, समयबद्ध क्रियान्वयन और ईमानदार मूल्यांकन जुड़ा हो। हमें यह पूछने का साहस रखना होगा कि क्या हमारी शिक्षा नीति वास्तव में शोध-केंद्रित हो पाई है? क्या हमारे विश्वविद्यालय वैश्विक ज्ञान-निर्माण में योगदान दे रहे हैं? क्या हमारे छात्र भविष्य की तकनीकों के लिए तैयार हैं या केवल वर्तमान की नौकरियों के लिए?
विकसित राष्ट्र वे नहीं होते जिनके पास केवल बड़ा बजट हो, बल्कि वे होते हैं जिनके पास स्पष्ट प्राथमिकताएँ होती हैं। वहाँ शिक्षा, स्वास्थ्य, विज्ञान और अनुसंधान पर खर्च बोझ नहीं, निवेश माना जाता है। वहाँ राजनीतिक परिवर्तन विकास की दिशा नहीं बदलते। हमारे यहाँ अक्सर योजनाएँ बदल जाती हैं, पर व्यवस्था नहीं बदलती। यही कारण है कि गति कभी तेज़ होती है, कभी धीमी-पर स्थिर नहीं रहती।
हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि जनसंख्या हमारी शक्ति तभी बनेगी जब वह कुशल, शिक्षित और स्वस्थ होगी। केवल संख्या बढ़ने से राष्ट्र नहीं बनता, गुणवत्ता बढ़ने से बनता है। यदि हमारी युवा आबादी को सही प्रशिक्षण, सही दृष्टि और सही अवसर न मिले, तो वही जनसंख्या बोझ बन सकती है। चीन ने इस बात को समय रहते समझ लिया, हम अभी भी इस समझ की प्रक्रिया में हैं।
विकास का एक बड़ा पक्ष वैज्ञानिक दृष्टिकोण है- जिसमें तर्क हो, प्रमाण हो और जिज्ञासा हो। समाज में जब अंधविश्वास की जगह प्रश्न लेने लगें, जब परंपरा के साथ प्रयोग जुड़ जाए और जब ज्ञान को पवित्र ही नहीं, उपयोगी भी माना जाए, तभी नवाचार जन्म लेता है। हमें बच्चों को यह सिखाना होगा कि विज्ञान संस्कृति का विरोधी नहीं, उसका विस्तार है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम भावनात्मक गर्व और बौद्धिक ईमानदारी के बीच संतुलन बनाएँ। न तो स्वयं को कम आँकें, न ही आत्ममुग्ध हों। हमें उन देशों से सीखना होगा जो हमसे आगे हैं- ईर्ष्या से नहीं, सीखने की विनम्रता से। हमें यह देखना होगा कि वे क्या विशेष करते हैं- कैसे वे शिक्षा को उत्पादन से जोड़ते हैं, कैसे वे शोध को उद्योग से जोड़ते हैं और कैसे वे नीति को दीर्घकालिक सोच से संचालित करते हैं।
भारत के पास वह सब कुछ है जो उसे विकसित राष्ट्र बना सकता है- इतिहास की गहराई, संस्कृति की ऊष्मा, युवाओं की ऊर्जा और लोकतंत्र की शक्ति। कमी केवल एक जगह है- निर्णायक परिवर्तन की सामूहिक इच्छा में। जब यह इच्छा शिक्षा- कक्षाओं से लेकर नीति-निर्माण तक स्पष्ट दिखाई देने लगेगी, तब विकास की गति केवल तेज़ नहीं होगी, बल्कि टिकाऊ भी होगी।
2047 केवल एक वर्ष नहीं है, वह एक परीक्षा है- हमारी दृष्टि की, हमारी तैयारी की और हमारी प्राथमिकताओं की। यदि हमने आज सही प्रश्न नहीं पूछे, तो कल उत्तर भी अधूरे होंगे। और यदि हमने आज शिक्षा, विज्ञान और शोध को राष्ट्र-धर्म नहीं बनाया, तो कल विश्वगुरु बनने की आकांक्षा केवल एक सुंदर कल्पना बनकर रह जाएगी।

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