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संविधान–धम्म संवाद : भारतीय संविधान और बौद्ध विचारों पर चिंतन

वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार
लखनऊ। संविधान दिवस के अवसर पर अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान, गोमती नगर, लखनऊ में संस्कृति विभाग उत्तर प्रदेश के तत्वावधान में “भारतीय संविधान एवं बौद्ध धम्म” विषय पर एक महत्वपूर्ण संगोष्ठी का आयोजन किया गया. कार्यक्रम की शुरुआत अपराह्न 11:30 बजे हुई, जब संस्थान के अधिकारियों और कर्मचारियों ने भारतीय संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ ग्रहण की. संविधान की प्रस्तावना के सामूहिक पाठ और शपथ ने परिसर में जिम्मेदारी और गौरव का भाव प्रवाहित कर दिया।
इसी क्रम में अपराह्न 3:00 बजे से आयोजित संगोष्ठी में मुख्य वक्ता के रूप में प्रो. सदानंद शाही, पूर्व कुलपति, पं. शंकराचार्य विश्वविद्यालय, भिलाई, छत्तीसगढ़, उपस्थित रहे. उन्होंने अपने संबोधन में भारतीय संविधान की लोकतांत्रिक भावना और बौद्ध धम्म के करुणा, समानता, नैतिकता तथा अहिंसा जैसे मूल सिद्धांतों के अंतर्निहित साम्य पर विस्तार से प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि बुद्ध की शिक्षाएं और संविधान की आत्मा दोनों मनुष्य की गरिमा, स्वतंत्रता और सामाजिक समरसता की स्थापना का साझा लक्ष्य रखते हैं।
सत्र के दौरान राजेश निर्मल द्वारा रचित एकल–संवादात्मक विशेष शो भी प्रस्तुत किया गया, जिसने दर्शन और कला का प्रभावी संगम मंच पर जीवंत कर दिया. संगोष्ठी में संस्थान के माननीय सदस्य तरुणेश बौद्ध, निदेशक डॉ. राकेश सिंह, प्रो. शंकराचार्य विश्वविद्यालय के प्रतिनिधि, बौद्ध भिक्षु, शोधार्थी, छात्र–छात्राएं तथा अन्य गणमान्य अतिथि बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का उद्देश्य संविधान के सामाजिक न्याय के आयाम और बौद्ध धम्म की मानवतावादी दृष्टि के बीच संवाद स्थापित कर युवा पीढ़ी को भारतीय ज्ञान परंपरा और संवैधानिक मूल्यों से जोड़ना रहा. संगोष्ठी ने स्पष्ट संदेश दिया कि संविधान और धम्म का समन्वित चिंतन ही एक समावेशी और संवेदनशील समाज की सुदृढ़ आधारशिला बन सकता है।

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