– लोकतंत्र की रीढ़ पर चोट, एफआईआर हलकी धाराओं में दर्ज
वेब वार्ता / अजय कुमार
लखनऊ। राजधानी में पत्रकार सुशील अवस्थी पर हुए हमले को चार दिन बीत चुके हैं, लेकिन पुलिस अब तक किसी आरोपी को गिरफ्तार नहीं कर सकी है। घटना के बाद से न तो हमलावरों का कोई सुराग मिला है और न ही जांच में कोई उल्लेखनीय प्रगति दिखाई दे रही है। इस सुस्ती ने पत्रकार समुदाय में गहरी नाराजगी पैदा कर दी है। उनका कहना है कि जब प्रदेश की राजधानी में पत्रकार सुरक्षित नहीं हैं, तो आम नागरिकों की सुरक्षा पर सवाल और गंभीर हो जाते हैं।
घटना के विरोध में सोमवार को वरिष्ठ पत्रकार प्रभात त्रिपाठी के आह्वान पर शहरभर के दर्जनों मीडिया कर्मी हजरतगंज की गांधी प्रतिमा पर एकत्र हुए और धरना-प्रदर्शन किया। पत्रकारों ने आरोप लगाया कि प्रशासनिक उदासीनता और पुलिस की धीमी कार्रवाई ने हमलावरों का मनोबल बढ़ाया है। प्रदर्शन के दौरान कई पत्रकारों ने कहा कि चार दिन बाद भी जीरो गिरफ्तारी इस बात का संकेत है कि जांच को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा।
धरने के दौरान वरिष्ठ अधिकारियों की अनुपस्थिति भी पत्रकारों के आक्रोश का कारण बनी। प्रदर्शन स्थल से जत्था मुख्यमंत्री आवास की ओर बढ़ने लगा, जिसे पुलिस ने राजभवन कॉलोनी चौराहे पर लगाए गए बैरिकेडिंग पर रोक लिया। यहां काफी देर तक नारेबाजी और विरोध जारी रहा। बाद में एडीसीपी पंकज दीक्षित मौके पर पहुंचे और आश्वासन दिया कि हमलावरों की जल्द पहचान कर उन्हें गिरफ्तार किया जाएगा तथा मामले में कठोर धाराओं के तहत कार्रवाई की जाएगी।
अधिकारियों के इस आश्वासन पर पत्रकारों ने प्रदर्शन समाप्त कर दिया, लेकिन स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि शीघ्र कार्रवाई नहीं हुई, तो आंदोलन को प्रदेशव्यापी रूप दिया जाएगा और दोबारा मुख्यमंत्री आवास की ओर कूच किया जाएगा।
पत्रकारों का कहना है कि यह हमला केवल एक व्यक्ति पर हिंसा नहीं, बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर सीधा प्रहार है। अब उनकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या पुलिस त्वरित कार्रवाई कर विश्वास बहाल करेगी, या यह मामला भी लापरवाही और टालमटोल की भेंट चढ़ जाएगा।