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भारत में अब सब्ज़ियों के दाम सिर्फ मंडी ही तय नहीं करती, बल्कि मौसम भी तय करता है

वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार
दिल्ली । दिल्ली की आज़ादपुर मंडी में सब्ज़ियों के बढ़े दामों ने रसोई से लेकर बाजार तक हाहाकार मचा दिया है। टमाटर, प्याज़ और आलू पर मौसम की मार ने न सिर्फ उपभोक्ताओं को परेशान किया बल्कि किसानों की कमर भी तोड़ दी है। मंडी में खरीदारों और विक्रेताओं के बीच तकरार आम हो गई है। दुकानदारों का कहना है कि अब सब्ज़ियों के दाम सिर्फ मंडी तय नहीं करती, बल्कि मौसम भी तय करता है,
बेमौसम बारिश और तेज़ गर्मी के कारण माल ही नहीं आ रहा, इसलिए दाम बढ़ना स्वाभाविक है। असल समस्या खेतों में है, जहाँ जलवायु संकट ने फसल को चौपट कर दिया है।
अब हम पिछले कुछ सालों पर अगर नज़र डालें तो देखते है की भाव मौसम के हिसाब से कैसे तय होते है। साल 2023 में टमाटर की पैदावार हिमाचल प्रदेश में करीब ग्यारह प्रतिशत और कर्नाटक में तेरह प्रतिशत घट गई। जून में दिल्ली में टमाटर अठारह रुपये किलो बिक रहा था जो जुलाई में बढ़कर सड़सठ रुपये किलो पहुंच गया। सप्लाई भी 400-500 टन से घटकर 318 टन रह गई। बारिश से फसल सड़ गई और जो माल मंडी तक पहुंचा उसकी गुणवत्ता खराब थी, लेकिन कम उपलब्धता के कारण दाम आसमान छू गए। प्याज़ की स्थिति भी कुछ ऐसी ही रही। महाराष्ट्र में ओलावृष्टि और बारिश ने नवंबर 2023 में प्याज़ की फसल बर्बाद कर दी, जिससे उत्पादन में लगभग 28 प्रतिशत गिरावट आई और दाम 30 रुपये से बढ़कर 39 रुपये किलो तक पहुंच गए।
आलू को हमेशा गरीब की थाली का सहारा माना जाता है, लेकिन 2023-24 में यह भी महंगा हो गया। पश्चिम बंगाल में बारिश और उत्तर प्रदेश में पाले की वजह से उत्पादन सात प्रतिशत घटा। अगस्त 2024 में आज़ादपुर मंडी में आलू 21 रुपये किलो बिका, जबकि पिछले वर्षों में यह 10 से 14 रुपये के बीच रहता था। 2024 में तो गर्मी का रिकॉर्ड टूटा, बेमौसम बरसात और बाढ़ ने हालात और बिगाड़ दिए। जुलाई 2023 में सब्ज़ियों की महंगाई 37 प्रतिशत थी, जो अक्टूबर 2024 में 42 प्रतिशत तक पहुंच गई।
इस संकट की सबसे बड़ी चोट छोटे किसानों पर पड़ी है। उनके पास न कोल्ड स्टोरेज है, न ट्रांसपोर्ट और न ही बीमा। कर्ज़ लेकर बीज बोने वाले किसान अक्सर बारिश और गर्मी की मार झेलते हुए कर्ज़ में दब जाते हैं। इस स्थिति से निपटने के लिए ग्रीनहाउस खेती, कोल्ड स्टोरेज और समय पर मौसम की जानकारी जैसे उपाय जरूरी हैं। अन्यथा जलवायु संकट के चलते आने वाले सालों में हमारी रसोई की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं।

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