वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार
लखनऊ। इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 में आयोजित “भारत की संप्रभु एआई और डेटा से प्रभाव का विस्तार” विषयक सत्र में विशेषज्ञों ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के माध्यम से समावेशी विकास की संभावनाओं और भारत की वैश्विक भूमिका पर विस्तृत चर्चा की। वक्ताओं ने कहा कि भारत को केवल एआई तकनीक का उपभोक्ता बनने के बजाय वैश्विक स्तर पर प्रासंगिक एआई प्रणालियों का निर्माता बनने की दिशा में आगे बढ़ना होगा। इसके लिए गहन शोध प्रतिभा, नवाचार निवेश और दीर्घकालिक शोध पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करना आवश्यक है।
चर्चा में एआई संप्रभुता के तीन प्रमुख आधार बताए गए, जिनमें भारतीय भाषाओं और सामाजिक संदर्भों के अनुरूप स्वदेशी एआई मॉडल विकसित करना, मजबूत घरेलू डिजिटल अवसंरचना तैयार करना और आधारभूत शोध को प्रोत्साहन देना शामिल है। विशेषज्ञों ने कहा कि एआई का उपयोग वित्तीय समावेशन, कृषि, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में प्रभावी समाधान देने के लिए होना चाहिए ताकि आम नागरिकों को सीधा लाभ मिल सके।
अभिषेक सिंह, महानिदेशक, National Informatics Centre (NIC) तथा अतिरिक्त सचिव, Ministry of Electronics and Information Technology (MeitY) ने कहा कि संप्रभु एआई का अर्थ अलग-थलग होकर काम करना नहीं है। वक्ताओं ने इस बात पर भी जोर दिया कि एआई संप्रभुता का अर्थ अलग-थलग होना नहीं, बल्कि एआई प्रणालियों के डिजाइन, संचालन और नीति निर्माण पर स्वदेशी नियंत्रण सुनिश्चित करना है। इससे नागरिकों को उनकी अपनी भाषाओं में सेवाएं उपलब्ध कराई जा सकेंगी और जीवन स्तर में सुधार संभव होगा। सत्र में यह भी कहा गया कि एआई का विस्तार चरणबद्ध तरीके से किया जाना चाहिए, खासकर शासन, नागरिक सेवाओं और वित्त जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में सावधानी के साथ इसे लागू किया जाना जरूरी है। साझा डिजिटल अवसंरचना, सामान्य मॉडल और सुरक्षित तकनीकी ढांचे के निर्माण से स्टार्टअप्स और नवोन्मेषकों को भी नई संभावनाएं मिलेंगी।
विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि भू-स्थानिक डेटा और उन्नत एआई तकनीक के संयोजन से कृषि, आपदा प्रबंधन, जलवायु पूर्वानुमान और शहरी नियोजन में बड़े सुधार संभव हैं। समिट में इस बात पर सहमति बनी कि सतत शोध, अवसंरचना विकास और संस्थागत सहयोग से भारत का एआई पारिस्थितिकी तंत्र मजबूत होगा और इससे समावेशी विकास को नई गति मिलेगी।