वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/अजय कुमार
बरेली। बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक दशहरा नजदीक आते ही बरेली में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले बनाने का काम तेज हो गया है। शहर में करीब दो सौ साल पुरानी इस परंपरा की खासियत यह है कि हिंदू और मुस्लिम कारीगर मिलकर पुतले तैयार करते हैं। आपसी सद्भाव और साझा संस्कृति की यह मिसाल पीढ़ियों से कायम है।
मलूकपुर में करीब 200 साल पहले शंकरलाल ने पुतले बनाने की शुरुआत की थी। समय के साथ यह काम उनके परिवार में आगे बढ़ता रहा। शंकरलाल के बाद विश्वनाथ ठाकुर ने परंपरा को संभाला। अब उनके दामाद पिछले 20 वर्षों से इस काम को आगे बढ़ा रहे हैं। पुतले बनाने के काम के चलते इलाके की एक गली का नाम भी रावण वाली गली पड़ गया।
कारीगरों ने बताया कि उन्होंने अपने ससुर विश्वनाथ ठाकुर से पुतले बनाने की कला सीखी थी। बाद में दूसरे स्थान पर चले गए, लेकिन पत्नी के कहने पर वापस बरेली लौटे और पुश्तैनी काम संभाल लिया। उनके मुताबिक, एक पुतला तैयार करने में करीब सात दिन लगते हैं। इस बार उन्हें 500 पुतले बनाने का ऑर्डर मिला है। वह सामान्य तौर पर 20 फुट तक ऊंचे पुतले बनाते हैं, जबकि 80 फुट ऊंचे पुतले बनाने का भी अनुभव रखते हैं।
महंगाई ने बढ़ाई कारीगरों की मुश्किलें :
कारीगरों का कहना है कि बांस की खपच्चियों, कागज, पन्नियों और मजदूरी की लागत लगातार बढ़ रही है। इसके बावजूद खानदानी परंपरा को बचाए रखने के लिए वे पूरी मेहनत से जुटे हैं। दशहरा के बाद आमदनी के लिए कई कारीगर चाट और मोमोज के ठेले लगाते हैं। बरेली की यह परंपरा बताती है कि त्योहार केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक मेलजोल और सांस्कृतिक एकता को मजबूत करने का माध्यम भी हैं।