वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/लखनऊ।
भारत में जब भी हॉकी की बात होती है, तो मेजर ध्यानचंद, के.डी. सिंह बाबू, मोहम्मद शाहिद या धनराज पिल्लै जैसे नाम बरबस ही याद आ जाते हैं। यही वे खिलाड़ी हैं जिन्होंने विश्व खेल मानचित्र पर भारत को “हॉकी का सम्राट” बनाकर प्रतिष्ठा दिलाई। परंतु आज, जब एफआईएच जूनियर हॉकी पुरुष विश्वकप की ट्रॉफी उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ पहुंची, तो यह केवल एक औपचारिक स्वागत नहीं था बल्कि उस गौरवशाली इतिहास का स्मरण था जिसे देश धीरे-धीरे भूलता जा रहा है।
जूनियर हॉकी विश्वकप: युवा प्रतिभाओं का मंच
एफआईएच (फेडरेशन इंटरनेशनल डी हॉकी) जूनियर पुरुष विश्वकप की शुरुआत वर्ष 1979 में फ्रांस के वर्साय में हुई थी। इसका उद्देश्य 21 वर्ष से कम आयु के खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा का अनुभव देना था। तब से यह टूर्नामेंट हर चार साल में आयोजित होता आ रहा है। भारत ने इस प्रतियोगिता में उल्लेखनीय सफलता अर्जित की है। 2001 (होबार्ट, ऑस्ट्रेलिया) और 2016 (लखनऊ, भारत) में भारतीय टीम ने खिताब जीते, जबकि कई बार सेमीफाइनल और क्वार्टर फाइनल तक पहुंचकर शानदार प्रदर्शन किया। वर्ष 2025 में चेन्नई और मदुरई में होने जा रहा टूर्नामेंट न केवल भारत के लिए मेजबानी का अवसर है, बल्कि हॉकी की नई पीढ़ी को वैश्विक मंच पर चमकने का मौका भी प्रदान करेगा।
लखनऊ में ट्रॉफी का आगमन: एक प्रतीकात्मक क्षण
12 नवंबर 2025 को जब ट्रॉफी लखनऊ पहुंची, तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसे “उत्तर प्रदेश के स्वर्णिम खेल इतिहास का स्मरण कराने वाला क्षण” बताया। उन्होंने न केवल मेजर ध्यानचंद और के.डी. सिंह बाबू जैसी महान हस्तियों को याद किया, बल्कि यह भी रेखांकित किया कि प्रदेश ने समय-समय पर ऐसे प्रतिभाशाली खिलाड़ी दिए हैं जिन्होंने भारतीय हॉकी की प्रतिष्ठा को विश्व स्तर पर ऊँचाई दी।
वास्तव में, लखनऊ में ट्रॉफी का स्वागत एक प्रतीकात्मक घटना थी। यह उस इतिहास की याद थी जिसमें उत्तर प्रदेश की मिट्टी ने हॉकी को दिशा दी, और साथ ही उस वर्तमान की झलक थी, जहां सरकारी उत्साह और संस्थागत प्रयासों के बीच अब भी कई कमियां बनी हुई हैं।
उत्तर प्रदेश की धरती और हॉकी की विरासत
उत्तर प्रदेश का हॉकी से रिश्ता एक सदी पुराना है। मेजर ध्यानचंद, जिन्हें ‘हॉकी का जादूगर’ कहा जाता है, झांसी के रहने वाले थे। उन्होंने तीन ओलंपिक स्वर्ण पदक (1928, 1932, 1936) भारत को दिलाए। उनके नाम पर देश का सर्वोच्च खेल सम्मान “मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार” रखा गया है। लखनऊ के के.डी. सिंह बाबू, जिनकी कप्तानी में भारत ने 1948 में ओलंपिक स्वर्ण जीता, भारतीय हॉकी के इतिहास में दूसरा स्वर्णिम अध्याय लिखते हैं। इसके अलावा मोहम्मद शाहिद, अशोक कुमार, रवींद्र पाल सिंह, सैयद अली, सुजीत कुमार, ललित उपाध्याय, दानिश मुतजबा, और राजकुमार पाल जैसे खिलाड़ी आज भी प्रेरणा का स्रोत हैं। महिला हॉकी में भी प्रदेश का योगदान कम नहीं रहा। पुष्पा श्रीवास्तव, प्रेम माया, मंजू बिष्ट, रंजना श्रीवास्तव, और प्रीति दुबे ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व कर उत्तर प्रदेश का गौरव बढ़ाया।
सरकारी योजनाएं और वास्तविक चुनौतियां
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लखनऊ में कहा कि “उत्तर प्रदेश में हॉकी की परंपरा को सहेजने और आगे बढ़ाने के लिए सरकार प्रतिबद्ध है।” मेरठ में मेजर ध्यानचंद स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी का निर्माण इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। वहीं बाराबंकी में के.डी. सिंह बाबू के पैतृक आवास को संग्रहालय के रूप में विकसित करने की प्रक्रिया भी चल रही है। हालांकि इन पहलों के बावजूद जमीनी स्तर पर हॉकी की स्थिति अब भी चिंताजनक है। राज्य के कई ज़िलों में खेल मैदानों की कमी, कोचिंग सुविधाओं का अभाव, उपकरणों की ऊंची लागत और खिलाड़ियों के लिए आर्थिक असुरक्षा जैसे कारक नई प्रतिभाओं को पीछे धकेल रहे हैं। कई बार खिलाड़ियों को अपने करियर के चरम पर नौकरी, सुविधाओं या सम्मान के लिए संघर्ष करते देखा गया है। यह विडंबना है कि जिसने देश को विश्व मंच पर गौरव दिलाया, वह सेवानिवृत्ति के बाद उपेक्षा का शिकार हो जाता है।
उदासीनता और उत्साह के बीच संतुलन
भारतीय राजनीति में क्रिकेट को मिलने वाला ध्यान अक्सर हॉकी सहित अन्य खेलों पर भारी पड़ता है। हॉकी का दर्शक वर्ग सिकुड़ता गया है और प्रायोजक भी सीमित हैं। हालांकि, हाल के वर्षों में सरकार और खेल संगठनों ने इस असंतुलन को समझा है। खेले इंडिया मिशन, राष्ट्रीय खेल विश्वविद्यालय जैसी योजनाएं इस दिशा में सुधार की उम्मीद जगाती हैं। उत्तर प्रदेश में भी ‘खेलो यूपी’ अभियान के तहत स्टेडियमों और मिनी-खेल परिसर विकसित किए जा रहे हैं। खेल छात्रवृत्तियाँ और हॉकी अकादमियाँ खिलाड़ियों को नई ऊर्जा दे रही हैं। लखनऊ, बाराबंकी, बनारस, सुल्तानपुर, गोरखपुर और मेरठ जैसे शहर अब हॉकी प्रशिक्षण केंद्रों के रूप में उभर रहे हैं।
फिर भी, विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हॉकी को उसकी पुरानी गरिमा दिलानी है, तो “भावनात्मक भाषणों से आगे बढ़कर” दीर्घकालिक नीति और पारदर्शी संरचना की आवश्यकता है। खेल विद्यालयों में प्रशिक्षकों की नियुक्ति, ग्रामीण स्तर पर टर्फ मैदानों का निर्माण और खिलाड़ियों के लिए वित्तीय सुरक्षा ही वह आधार हो सकता है जो हॉकी को फिर से जनता के दिलों में लौटा सके।
नई पीढ़ी की उम्मीदें
एफआईएच जूनियर हॉकी विश्वकप जैसी प्रतियोगिताएँ इस दिशा में उम्मीद की किरण हैं। यह सिर्फ एक टूर्नामेंट नहीं, बल्कि युवाओं को यह दिखाने का मंच है कि मेहनत, अनुशासन और राष्ट्रीय गौरव के बीच से ही नायक निकलते हैं। आज के युवा खिलाड़ी चाहे वे सुल्तानपुर के खेतों से निकल रहे हों या बाराबंकी के किसी छोटे अकादमी से मेजर ध्यानचंद और मोहम्मद शाहिद जैसे दिग्गजों को अपने आदर्श मानते हैं। उनके लिए यह ट्रॉफी सिर्फ एक धातु की वस्तु नहीं, बल्कि उस सपने का प्रतीक है जो कभी भारत को हॉकी का बादशाह बनाता था।
बॉक्स : स्वर्णिम अतीत की ओर लौटने की जरूरत
लखनऊ में एफआईएच जूनियर हॉकी विश्वकप ट्रॉफी का आगमन केवल एक खेल आयोजन का संकेत नहीं, बल्कि एक आह्वान है, उस राष्ट्रीय भावना को पुनर्जीवित करने का, जिसने कभी हर भारतीय के भीतर हॉकी के लिए जोश और गर्व जगाया था। सरकार का उत्साह स्वागतयोग्य है, लेकिन यह तभी सार्थक होगा जब यह जमीनी स्तर पर खेल संस्कृति को बदल सके। हॉकी के स्वर्णिम इतिहास को केवल म्यूजियम की दीवारों पर नहीं, बल्कि बच्चों के हाथों में चमकती स्टिक में जीवित रखने की आवश्यकता है। अगर भारत फिर से हॉकी का “सम्राट” बनना चाहता है, तो उसे अपने खिलाड़ियों को सिर्फ सम्मान ही नहीं, संसाधन और स्थिरता भी देनी होगी। तभी मेजर ध्यानचंद का वह सपना “भारत की हर गली में हॉकी खेले जाने वाला देश” सच हो सकेगा। हांलाकि यह वर्तमान निदेशक आरपी सिंह के रहते संभव नहीं है।

लेखक : अजय कुमार “काशी रत्न”
वरिष्ठ स्तम्भकार