– दशहरे पर खुलता है कानपुर का अद्वितीय दशानन मंदिर
– विजयदशमी पर उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़
वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार
कानपूर। कानपुर का दशानन मंदिर हर साल विजयदशमी के अवसर पर खास चर्चा में रहता है, क्योंकि यह मंदिर पूरे साल में सिर्फ एक दिन भक्तों के लिए खोला जाता है। शिवाला क्षेत्र के कैलाश मंदिर परिसर में स्थित यह अनोखा मंदिर वर्ष 1868 में महाराज गुरु प्रसाद शुक्ल द्वारा बनवाया गया था। मंदिर की विशेषता यह है कि यहां रावण की पूजा होती है। जहां सामान्य मान्यता में रावण को बुराई और अहंकार का प्रतीक माना जाता है, वहीं इस मंदिर में उसे विद्या, बल और शिवभक्ति का प्रतीक मानकर आराधना की जाती है। कहा जाता है कि गुरु प्रसाद शुक्ल भगवान शिव के परम भक्त थे और उन्होंने रावण को केवल खलनायक के रूप में नहीं देखा, बल्कि एक महान पंडित और शिवभक्त के रूप में स्वीकार किया। यही कारण है कि उन्होंने यहां रावण की प्रतिमा स्थापित की।
मंदिर से जुड़ी एक पौराणिक कथा भी प्रचलित है। मान्यता के अनुसार, मां छिन्नमस्तिका ने रावण को यह वरदान दिया था कि उसकी पूजा तभी पूर्ण होगी जब भक्त उसकी भी आराधना करेंगे। इसी वजह से दशहरे के दिन यहां विशेष पूजा का आयोजन होता है। विजयदशमी के दिन सबसे पहले मां छिन्नमस्तिका की पूजा होती है, इसके बाद रावण की आरती की जाती है। श्रद्धालु सरसों के तेल के दीपक और पीले फूल अर्पित करते हैं और बल, बुद्धि व ज्ञान का आशीर्वाद मांगते हैं। इस अनोखी परंपरा को देखने और इसमें शामिल होने के लिए हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं।
साल में केवल एक दिन खुलने वाले इस मंदिर में विजयदशमी के मौके पर मेले जैसा माहौल बन जाता है। धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण यह स्थल सामाजिक समन्वय और वैचारिक विविधता का भी प्रतीक माना जाता है।
हिंदुस्तान में कानपूर के अलावा और भी जगह है जहाँ रावण की पूजा होती है और इन जगहों पर नहीं होता है रावण दहन। आइये जानते है वह जगह कहा कहा पर है। ये स्थान अपनी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक मान्यताओं के कारण रावण को श्रद्धा और सम्मान के साथ पूजते हैं।
बिसरख : उत्तर प्रदेश में बिसरख गांव को रावण का ननिहाल माना जाता है। यहां का लंकापति मंदिर दशहरे पर खुलता है और रावण की पूजा होती है, इसलिए इस गांव में लंका दहन नहीं किया जाता।
बड़ागांव : बागपत जिले के बड़ागांव में भी लोग रावण को अपने पूर्वज मानते हैं और यहां दशहरे पर पूजा होती है। कहा जाता है कि रावण ने यहां तप कर मां मनसा देवी की प्रतिमा स्थापित की थी।
कानपूर : कानपुर में स्थित दशानन मंदिर 100 साल से भी पुराना है और साल में केवल एक दिन दशहरे पर खुलता है। यहां कई भक्त रावण की पूजा करते हैं। अभिलेखों के अनुसार, इसका निर्माण राजा गुरु प्रसाद शुक्ल ने 1890 में करवाया था।
उज्जैन : मध्य प्रदेश में उज्जैन के चिखली गांव में रावण की पूजा की जाती है। यहां के लोग मानते हैं कि यदि रावण की पूजा न की जाए तो गांव जलकर राख हो सकता है।
मंदसौर : मंदसौर में भी रावण दहन नहीं होता, क्योंकि इसे रावण की पत्नी मंदोदरी के मायके से जोड़ा जाता है।
कांगड़ा : हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के बैजनाथ में भी रावण की पूजा होती है। कहा जाता है कि रावण ने यहां शिव की कठोर तपस्या की थी। लोग मानते हैं कि रावण को दहन करने पर मृत्यु का खतरा हो सकता है।
अमरावती : महाराष्ट्र के अमरावती जिले के आदिवासी समुदाय रावण और उसके पुत्र को अपना देवता मानते हैं और दशहरे पर उसकी पूजा करते हैं।
जोधपुर : राजस्थान के जोधपुर में एक समाज खुद को रावण का वंशज मानता है और दशहरे पर रावण दहन की बजाय उसकी आराधना करता है।
काकिनाड : आंध्र प्रदेश के काकिनाड में रावण का मंदिर है और यहां लोग उसे शक्ति सम्राट मानकर पूजा करते हैं।
मालवली : कर्नाटक के कोलार और मंडया जिले के मालवली में भी रावण को भगवान शिव का परम भक्त मानते हुए दशहरे पर पूजा की जाती है।
इस तरह भारत के विभिन्न हिस्सों में रावण को केवल खलनायक नहीं बल्कि विद्या, शक्ति और शिवभक्ति का प्रतीक मानकर उसका सम्मान किया जाता है। ये स्थल अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विशिष्टता के लिए विशेष महत्व रखते हैं।