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हिन्दू बच्चों का मौलिक अधिकार है धर्म की शिक्षा: अविमुक्तेश्वरानन्दः सरस्वती

वेब वार्ता (न्यूज एजेंसी)/ अजय कुमार
प्रयागराज। मानव जीवन के कई कोण हैं, जिनमे धार्मिकता भी सम्मिलित है। चूँकि हमारा पूरा जीवन धर्मसम्मत बीतता है, इसलिए आरम्भिक जीवन में ही हम धर्म के नियम-विनियमों के साथ ही साथ उसके मर्म को भी शिक्षा के माध्यम से समझ लिया करते थे। यह माना जाता था कि धर्मविहीन जीवन पशु जीवन है। धर्मेण हीनः पशुभिः समानः। अध्ययन की समाप्ति के बाद गुरुकुल से घर लौटते समय हमारा गुरु अपने बच्चे को दीक्षान्त समारोह में आदेश देता था-सत्यम् वद।धर्मं चर आदि। जिसका तात्पर्य धर्मानुकूल जीवन बिताने के आदेश से होता था। उक्त बातें उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शङ्कराचार्य अविमुक्तेश्वरानन्दः सरस्वती १००८ ने कही।
अविमुक्तेश्वरानन्दः ने कहा कि धर्मशिक्षा हमारे जीवन का अनिवार्य अंग होती थी, पर स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद स्वीकृत संविधान की धारा ३० ने देश के अल्पसंख्यकों को तो धार्मिक आधार पर शिक्षण संस्थान बनाने और संचालित करने का अधिकार दिया पर हम बहुसंख्यकों को इस सुविधा से वंचित कर दिया और परिणामस्वरूप आज ७५ वर्ष से आगे आ जाने पर भी हिन्दुओं के बच्चे धार्मिक शिक्षा से पूरी तरह वञ्चित होकर किङ्कर्तव्यविमूढ़ अथवा मतान्तर के लिए मजबूर हो रहे हैं। धार्मिक शिक्षा प्राप्त करना हर हिन्दू बच्चे का मौलिक अधिकार है। आवयश्कता होने पर संविधान में संशोधन किया जाए और हर हिन्दू बच्चे को उसके धर्म की शिक्षा प्राप्त करने के लिए पर्याप्त व्यवस्था और वातावरण उपलब्ध कराया जाए।

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