वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/अजय कुमार
लखनऊ। राजधानी में सफाई और कूड़ा उठान से जुड़े कर्मचारियों के बीच अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान को लेकर पिछले दो वर्षों से चल रही कवायद के बावजूद अब तक एक भी व्यक्ति के बांग्लादेशी नागरिक होने की पुष्टि नहीं हुई है। नगर निगम की ओर से अलग-अलग स्तर पर सत्यापन और जांच के निर्देश दिए गए, लेकिन कार्रवाई किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुंच सकी। दिसंबर 2025 में भी नगर निगम ने आउटसोर्स सफाई कर्मियों के दस्तावेजों की जांच और पुलिस सत्यापन कराने के निर्देश दिए थे।
महापौर सुषमा खर्कवाल ने पिछले वर्ष कई बस्तियों और सफाई व्यवस्था से जुड़े स्थानों का औचक निरीक्षण किया था। दिसंबर 2025 में बहादुर बस्ती में भी पहचान संबंधी दस्तावेज दिखाने के निर्देश दिए गए थे। इससे पहले इंदिरानगर के चांदन गांव में सफाई कर्मियों को लेकर विवाद सामने आया था। इसके बाद प्रशासन और पुलिस की मौजूदगी में कार्रवाई हुई थी।
नगर निगम में सफाई व्यवस्था निजी कंपनियों और कार्यदायी संस्थाओं के माध्यम से संचालित होती है। ऐसे में सभी कर्मचारियों के दस्तावेजों का सत्यापन कराने के निर्देश दिए गए थे। जोनल अधिकारियों और सैनिटरी निरीक्षकों को भी इस संबंध में रिपोर्ट तैयार करने को कहा गया था। इस अभियान के दौरान निजी एजेंसियों से जुड़े कई कर्मचारियों के काम छोड़ने की खबर भी सामने आई थी। हालांकि, नौकरी छोड़ने वाले सभी कर्मचारियों को अवैध विदेशी नागरिक मानने की पुष्टि नहीं हुई है। कुछ रिपोर्टों में दस्तावेज सत्यापन अभियान के बीच बड़ी संख्या में सफाई कर्मियों के गायब होने का उल्लेख किया गया था।
अब सवाल यह है कि लगातार जांच और सत्यापन के दावों के बावजूद यदि एक भी अवैध बांग्लादेशी नागरिक की पहचान नहीं हुई तो पिछले दो वर्षों से चल रही कवायद का वास्तविक परिणाम क्या रहा। नगर निगम के स्तर पर सफाई कर्मियों का समेकित और प्रमाणित रिकॉर्ड तैयार करना भी इस पूरी प्रक्रिया की अहम कड़ी माना जा रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार उस समय करीब 15 हजार आउटसोर्स सफाई कर्मियों की समेकित सूची उपलब्ध नहीं थी।