वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार
गोरखपुर। पूर्वांचल की दलित राजनीति में श्रवण कुमार निराला को एक सक्रिय और संघर्षशील चेहरे के रूप में देखा जा रहा है। छात्र राजनीति से अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत करने वाले निराला लंबे समय तक बहुजन आंदोलन की विचारधारा से जुड़े रहे। बाद में उन्होंने राजनीतिक और सामाजिक अभियानों के माध्यम से भूमिहीनों, गरीबों, दलितों और वंचित वर्गों के अधिकारों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। समर्थकों का कहना है कि उनकी राजनीति का केंद्र सामाजिक सरोकार रहे हैं, न कि केवल सत्ता की राजनीति।
निराला भूमि अधिकार, भूमिहीन परिवारों को कृषि योग्य भूमि उपलब्ध कराने, दलित उत्पीड़न के मामलों में पीड़ितों को न्याय दिलाने तथा आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं के शोषण के खिलाफ लगातार आवाज उठाते रहे हैं। इसी वजह से उन्हें जमीनी स्तर पर सक्रिय नेता के रूप में पहचान मिली है। उनके समर्थकों का दावा है कि वे विभिन्न सामाजिक आंदोलनों के माध्यम से वंचित समुदायों के बीच लगातार संपर्क बनाए हुए हैं।
बहुजन समाज पार्टी से अलग होने के बाद भी पूर्वांचल के कई जिलों में उनका प्रभाव बना रहने का दावा किया जाता है। समर्थकों के अनुसार, दलित युवाओं के अलावा निषाद, राजभर, चौहान और अन्य पिछड़े एवं वंचित समुदायों के लोग भी उनके अभियानों से जुड़े हैं। उनका मानना है कि सामाजिक न्याय और अधिकारों की लड़ाई ने विभिन्न वर्गों के बीच उन्हें एक अलग पहचान दिलाई है।
हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संगठन को और मजबूत करना, जनसमर्थन को चुनावी सफलता में बदलना तथा मुख्यधारा की राजनीति में अपनी स्थिति सुदृढ़ करना उनके सामने बड़ी चुनौती है। समर्थकों का विश्वास है कि 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले अंबेडकर जन मोर्चा संगठन विस्तार और जनसंपर्क अभियान के जरिए अपनी राजनीतिक उपस्थिति को और मजबूत करने का प्रयास करेगा।