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पड़ोसी देशों की उथल-पुथल के बीच भारत बना स्थिरता का प्रतीक

वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/अजय कुमार
लखनऊ। भारत की स्थिरता की विशिष्ट स्थिति इस समय दक्षिण एशिया में एक अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत करती है। जब उसके पड़ोसी देश राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक संकट और सामाजिक उथल-पुथल से गुजर रहे हैं, तब भारत आश्चर्यजनक रूप से शांत और संतुलित दिखाई देता है।
दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में भारत इस समय उल्लेखनीय रूप से स्थिर है। देश के विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 700 अरब डॉलर तक पहुँच चुके हैं, जो 11 महीनों के आयात के लिए पर्याप्त हैं। विकास दर छह से आठ प्रतिशत प्रतिवर्ष के बीच बनी हुई है, जबकि सरकारी बॉन्ड की यील्ड दर सात प्रतिशत से नीचे है। इसके विपरीत, पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे देशों को 12 प्रतिशत ब्याज दर देनी पड़ रही है। गैर-निष्पादित ऋणों में भारी कमी आई है, जो 2018 के 15 प्रतिशत से घटकर अब लगभग तीन प्रतिशत पर पहुंच गए हैं।
भारत की वित्तीय नीतियों में अनुशासन और निरंतर सुधार ने इस स्थिरता को मजबूत किया है। कोविड महामारी के समय जहां बजट घाटा नौ प्रतिशत तक पहुंच गया था, वहीं अब इसे घटाकर पांच प्रतिशत से कम कर दिया गया है। सरकार ने 2031 तक ऋण-से-जीडीपी अनुपात को 57 प्रतिशत से घटाकर 50 प्रतिशत करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। बैंकिंग प्रणाली और दिवालियापन कानूनों में सुधारों ने निवेशकों का भरोसा बढ़ाया है और अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों से बचाए रखा है। ऊर्जा क्षेत्र में भी भारत ने उल्लेखनीय आत्मनिर्भरता हासिल की है। सस्ते रूसी कच्चे तेल के आयात से विदेशी मुद्रा की बचत हुई है, जबकि पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण नीति ने तेल पर निर्भरता कम की है और गन्ना किसानों को लाभ पहुंचाया है।
हालांकि देश में बेरोजगारी और असमानता की चुनौतियां बनी हुई हैं, फिर भी व्यापक स्तर पर कोई राजनीतिक असंतोष नहीं दिखाई देता। इसके पीछे एक बड़ा कारण यह है कि भारतीय समाज में भविष्य के प्रति विश्वास कायम है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के सर्वेक्षण में अधिकांश लोगों ने अपने वर्तमान जीवन को औसत अंक दिए हैं, लेकिन आने वाले वर्षों को लेकर उनकी उम्मीदें अधिक हैं। पड़ोसी देशों की उथल-पुथल के बीच भारत की यह स्थिरता इस बात का संकेत है कि देश ने आर्थिक प्रबंधन, वित्तीय अनुशासन और संस्थागत सुधारों के माध्यम से अपनी नीतिगत नींव को मजबूत किया है। भारतीय समाज में यह भावना गहराई से मौजूद है कि बेहतर समय आने वाला है, और यही विश्वास भारत की विशिष्ट स्थिरता की पहचान बन गया है।

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