– विवाह से पहले और गर्भावस्था की शुरुआत में एचपीएलसी जांच पर विशेषज्ञों ने दिया जोर
वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार
कानपुर। जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के पैथोलॉजी विभाग में किए गए शोध ने कानपुर क्षेत्र में हीमोग्लोबिन ई (एचबीई) वैरिएंट की महत्वपूर्ण मौजूदगी का संकेत दिया है। अध्ययन में 83 पुष्ट हीमोग्लोबिन विकार मामलों में एचबीई ट्रेट की हिस्सेदारी 10.8 प्रतिशत पाई गई। कंपाउंड एचबीई-बीटा थैलेसीमिया के मामलों को शामिल करने पर यह आंकड़ा 12 प्रतिशत से अधिक हो गया। शोधकर्ताओं के अनुसार यह क्षेत्र में जनसांख्यिकीय आवागमन और आनुवंशिक मिश्रण की ओर संकेत करता है।
जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. संजय काला ने शोध के लिए पैथोलॉजी विभाग को बधाई दी। उन्होंने कहा कि गर्भवती महिलाओं की समय पर जांच महत्वपूर्ण है। वहीं, विवाह से पहले एचपीएलसी जांच कराने से रक्त संबंधी आनुवंशिक विकारों की पहचान कर भविष्य में गंभीर बीमारी के जोखिम को कम किया जा सकता है।
यह शोध एमडी रेजिडेंट डॉ. पूजा सैनी ने डॉ. सुनीता और विभागाध्यक्ष डॉ. लुबना खान के मार्गदर्शन में किया। शोधकर्ताओं ने उत्तर भारत में एनीमिया के मूल्यांकन के दौरान चिकित्सकों और स्त्री रोग विशेषज्ञों को एचबीई की संभावना पर भी ध्यान देने की सलाह दी है।
अध्ययन में सामने आया कि एचबीई ट्रेट वाले सभी मरीज लक्षणहीन थे और उनका हीमोग्लोबिन सामान्य के करीब था। यही कारण है कि केवल लक्षणों के आधार पर ऐसे वाहकों की पहचान मुश्किल हो सकती है। दूसरी ओर, एचबीई ट्रेट का बीटा-थैलेसीमिया ट्रेट के साथ सह-उत्तराधिकार होने पर एचबीई-बीटा थैलेसीमिया जैसी गंभीर स्थिति पैदा हो सकती है। ऐसे मामलों में बच्चों में गंभीर एनीमिया और शारीरिक विकास प्रभावित होने का खतरा रहता है।
शोध के अनुसार करीब 70 प्रतिशत मामले गर्भावस्था के दौरान नियमित एएनसी जांच में सामने आए। विशेषज्ञों ने गर्भावस्था के शुरुआती चरण में एचपीएलसी जांच और जरूरत पड़ने पर जीवनसाथी की स्क्रीनिंग को महत्वपूर्ण बताया है।