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गणेश चतुर्थी पर ऐसे करें शास्त्रसम्मत पूजा, जानें मूर्ति स्थापना से विसर्जन तक की विधि

वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार
लखनऊ। गणेश चतुर्थी हिंदू धर्म के प्रमुख पर्वों में से एक है। सनातन संस्था द्वारा संकलित लेख के अनुसार, गणेश चतुर्थी के दिन पृथ्वी पर गणेशतत्त्व सामान्य दिनों की तुलना में सहस्र गुना अधिक सक्रिय रहता है। इस अवधि में श्री गणेश की भावपूर्ण उपासना करने से साधक को गणेशतत्त्व का अधिक लाभ मिलने की मान्यता है। सुखकर्ता और विघ्नहर्ता भगवान गणेश की आराधना कर भक्त उनके कृपाशीर्वाद की कामना करते हैं।
सिद्धिविनायक व्रत का विशेष महत्त्व:    गणेश चतुर्थी के व्रत को सिद्धिविनायक व्रत भी कहा जाता है। लेख के अनुसार, प्रत्येक परिवार में यह व्रत किया जाना चाहिए। यदि भाइयों की रसोई और धन-कोष साझा है तो एक ही गणेशमूर्ति की पूजा पर्याप्त है। अलग-अलग गृहस्थी होने पर प्रत्येक घर में अलग गणेशमूर्ति स्थापित करने की परंपरा बताई गई है।
हर वर्ष नई मूर्ति क्यों:   गणेश चतुर्थी पर घर में पहले से गणपति की मूर्ति होने के बावजूद नई मूर्ति स्थापित करने की बात कही गई है। मान्यता के अनुसार, चतुर्थी के समय गणेशतत्त्व की तरंगें अधिक मात्रा में सक्रिय रहती हैं। इसलिए उत्सव के लिए नई मूर्ति स्थापित कर बाद में उसका विसर्जन करना शास्त्रसम्मत माना गया है।
मूर्ति कैसी हो:   गणेशमूर्ति चिकनी मिट्टी की, करीब एक से डेढ़ फुट ऊंची, पीढ़े पर विराजमान और बाईं ओर सूंड वाली होनी चाहिए। प्राकृतिक रंगों से रंगी मूर्ति को प्राथमिकता दी गई है। प्लास्टर ऑफ पेरिस अथवा कागज की मूर्तियों को शास्त्रसम्मत नहीं माना गया है।
स्थापना से पहले की तैयारी:   गणेशमूर्ति एक दिन पहले घर लाना उत्तम माना गया है। मूर्ति को स्वच्छ वस्त्र से ढककर ‘गणपति बाप्पा मोरया’ के जयघोष और नामजप के साथ घर लाने की बात कही गई है। घर में प्रवेश से पहले आरती कर मूर्ति को मंडप में पूजा की चौकी पर अक्षत के ऊपर स्थापित किया जाता है। मूर्ति का मुख पश्चिम दिशा की ओर रखना श्रेष्ठ बताया गया है। दक्षिण दिशा की ओर मुख रखने से बचने की सलाह दी गई है।
प्रतिदिन पूजा और विसर्जन:   गणपति के विराजमान रहने तक सुबह-शाम पंचोपचार पूजन के बाद आरती और मंत्रपुष्प का पाठ करना चाहिए। विसर्जन से पहले उत्तरपूजा में आचमन, संकल्प, चंदन, अक्षत, पुष्प, हल्दी-कुंकुम, दूर्वा, धूप-दीप और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद आरती कर गणेशमूर्ति का श्रद्धापूर्वक विसर्जन किया जाता है। शास्त्रविधि में चतुर्थी के दिन विसर्जन का उल्लेख है, जबकि परंपरा के अनुसार डेढ़, पांच, सात या दस दिनों तक गणपति को विराजमान रखने की प्रथा भी प्रचलित है।
इस प्रकार गणेश चतुर्थी केवल उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि श्रद्धा, भक्तिभाव और श्री गणेश की उपासना का विशेष पर्व है। शास्त्रसम्मत विधि से पूजा कर भक्त विघ्नहर्ता गणेश से सुख-समृद्धि और जीवन के सभी विघ्न दूर करने की प्रार्थना करते हैं।

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