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आदिवासी महिलाओं की भूमिका और नेतृत्व : सावित्री ठाकुर

वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)
लखनऊ। भारत विविध सांस्कृतिक परंपराओं और जीवन-पद्धतियों से समृद्ध देश है। अनुसूचित जनजातियों की आबादी 10.45 करोड़ से अधिक है, जो देश की कुल जनसंख्या का लगभग 8.6 प्रतिशत है। यह केवल एक सांख्यिकीय तथ्य नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन, जीवंत और बहुविध सांस्कृतिक धरोहर का परिचायक है। आदिवासी समुदाय सदियों से प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर जल, जंगल और जमीन के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता आया है। इस समाज की आत्मा आदिवासी महिलाएँ हैं, जिन्होंने परिवार, समुदाय और संस्कृति को जोड़े रखने में केंद्रीय भूमिका निभाई है।
दुर्भाग्य से लंबे समय तक आदिवासी समाज, विशेषकर महिलाओं को, विकास की मुख्यधारा में वह स्थान नहीं मिला जिसकी वे हकदार थीं। उन्हें परंपराओं का संवाहक तो माना गया, लेकिन नेतृत्वकर्ता और निर्णयकर्ता के रूप में पहचान नहीं मिली। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में इस सोच में बदलाव आया है। टोकन पहल से आगे बढ़कर लक्ष्य आधारित सशक्तिकरण की नीति अपनाई गई है, जिससे आदिवासी महिलाएँ अब विकास की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार बन रही हैं।
बजट आवंटन में हुई उल्लेखनीय वृद्धि यह दर्शाती है कि सरकार आदिवासी समुदायों के सर्वांगीण विकास के प्रति प्रतिबद्ध है। शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका और उद्यमिता के माध्यम से महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है। आदिवासी महिला सशक्तिकरण योजनाओं के तहत कम ब्याज दर पर ऋण, कौशल प्रशिक्षण और बाजार से जुड़ाव ने उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत किया है।
आज आदिवासी महिलाओं की भूमिका केवल घरेलू या सामुदायिक स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि शासन, नीति निर्माण और राष्ट्रीय नेतृत्व तक विस्तृत हो चुकी है। राष्ट्रपति के पद पर एक आदिवासी महिला का आसीन होना इस परिवर्तन का सशक्त प्रतीक है। यह स्पष्ट करता है कि आदिवासी महिलाएँ अब केवल विकास की लाभार्थी नहीं, बल्कि भारत के भविष्य की दिशा तय करने वाली नेतृत्वकर्ता हैं।

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