Breaking News

जिसकी खुशबू अब बस यादों में बाकी है … उल्टी यात्रा — बचपन की ओर

– उल्टी यात्रा — बचपन की ओर : 2024 से 1960 के दशक तक…
वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी) / अजय कुमार
लखनऊ। ये यात्रा खासकर उनके लिए है जो पचास पार कर चुके हैं या उसके करीब हैं :-
हम वो पीढ़ी हैं जिसने शायद सबसे ज़्यादा बदलाव अपनी आँखों से देखे है। बैलगाड़ी से लेकर सुपरसोनिक जेट तक।
बैरंग ख़त, टेलीग्राम से लेकर लाइव चैट तक, और “वर्चुअल मीटिंग” जैसी कभी असंभव लगने वाली बातें सच होते हुए देखीं।
हम वो आख़िरी लोग हैं—
जिन्होंने मिट्टी के घर में बैठकर परियों और राजाओं की कहानियाँ सुनीं। ज़मीन पर बैठकर खाना खाया, प्लेट में डाल-डाल कर सुड़कते हुए चाय पी।
हम वो लोग हैं—
जिन्होंने मोहल्ले के मैदानों में गिल्ली-डंडा, खो-खो, कबड्डी, कंचे और छुपा-छुपी, एन्ड ताड़ी जैसे खेल खेले।
हम वो लोग हैं—
जिन्होंने चाँदनी रात में लालटेन या पीली रोशनी वाले बल्ब में होमवर्क किया,
और दिन में चादर ओढ़कर माँ की चोरी से नावेल पढ़ी।
हम वही लोग हैं—
जिन्होंने अपनों को खत लिखे, जिनके जवाब आने में महीनों लगते थे। जिन्होंने बिना कूलर, एसी और हीटर के बचपन गुज़ारा। बिजली गई तो भी दिन अच्छे से काटे।
हम वो हैं—
जिन्होंने बालों में सरसों का तेल लगाकर स्कूल और शादियों में हाज़िरी दी। जिन्होंने स्याही वाली दवात और सेठे की कलम से लिखाई की, तख़्ती धोई, कॉपी-किताबें और कपड़े नीले-काले किए।
हम वो लोग हैं—
जिन्होंने मास्टर जी से मार खाई और घर शिकायत करने पर फिर मार खाई। लेकिन हमारे माँ बाप कभी स्कूल जाकर शिकायत नहीं कि क्यों मेरे बेटे को मारा।
हम वो हैं— जो मोहल्ले के बुज़ुर्गों को देखकर नुक्कड़ से ही घर लौट आते थे। जिन्होंने स्कूल के सफ़ेद केनवास जूतों पर खड़िया का पेस्ट लगाया।
हम वो हैं—
जिन्होंने गुड़ की चाय पी, लाल-काले दंतमंजन और नमक से दाँत साफ़ किए, कभी लकड़ी के कोयले से भी, बारातों में दातून का फैशन था। खेतों में लैट्रिन करने जाते थे। तीन दिन की बारात करते थे।
हम वही लोग हैं—
जो १० पैसे देकर किराये की साइकल से मोहल्ला घूम आते थे।
हम वही लोग हैं—
जिन्होंने रेडियो पर BBC की ख़बरें, विविध भारती, बिनाका गीत माला और हवा महल सुने।
हम वही लोग हैं—
शाम होते ही छत पर पानी छिड़का, सफ़ेद चादरें बिछाईं, एक स्टैंड वाला पंखा सबके लिए हवा करता था और सुबह सूरज निकलते ही दिन की रौनक शुरू हो जाती थी।
हम वो हैं…
जो अपनी गर्ल्फ्रैंड को केवल नज़रों से दूर से देखा करते थे, पास जाने की हिम्मत नहीं होती थी, बहुत हिम्मत की तो लव लेटर किताबों के बीच छुपा कर दे दिया। मिलना तो बहुत दूर की बात है। लेकिन फिर भी उस अहसास का अपना ही एक अलग आनंद था।
हम वो हैं…
जो बाप की मार खाना शान समझते थे, कभी उफ़ भी नहीं करते थे।
हम वो हैं—
जिन्होंने आर्यभट्ट, अपोलो 11 जैसे उपग्रह देखे।
हम वही लोग हैं—
जिन्होंने पाकिस्तान के दो टुकड़े होते देखा और अपनी सेना के शौर्य गाथा को फिल्म के परदे से लेकर गली गली गण शान समझते थे। और आज भी 15 अगस्त, 26 जनवरी और २ अक्टूबर को उन्ही गानों से अपनी यादों को ताज़ा करते है।
हम वही लोग हैं—
जो आख़िरी बार उस मासूम, धीमी और सच्ची ज़िंदगी को जी आए हैं, जिसकी खुशबू अब बस यादों में बाकी है। जहाँ अपनों से मिलने की याद की खुशबू थे इंतज़ार रहता था। (शेष अगले पार्ट में )

Check Also

मोबाइल टॉवर पूरी तरह सुरक्षित, अफवाहों से बचने की अपील

वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार लखनऊ। भारत सरकार के संचार मंत्रालय के अंतर्गत दूरसंचार …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Live Updates COVID-19 CASES