Breaking News

बदरीनाथ-केदारनाथ ही नहीं, चारधाम से जुड़े 48 तीर्थ स्थलों में गैर-हिंदुओं की एंट्री पर प्रस्ताव

वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार
उत्तराखंड। बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति ने चारधाम और उनसे जुड़े 48 प्रमुख तीर्थ स्थलों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव रखकर प्रदेश की राजनीति और सामाजिक विमर्श को गरमा दिया है। समिति का तर्क है कि बदरीनाथ और केदारनाथ जैसे धाम पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि सनातन धर्म के सर्वोच्च आध्यात्मिक केंद्र हैं, जहां प्रवेश को नागरिक अधिकार के बजाय धार्मिक परंपरा और आस्था से जोड़कर देखा जाना चाहिए। समिति के अध्यक्ष का कहना है कि सदियों से संत समाज और प्रमुख धार्मिक गुरुओं की यही मान्यता रही है कि इन पवित्र स्थलों की मर्यादा और परंपराओं की रक्षा आवश्यक है।
मंदिर समिति के अनुसार चारधाम केवल दर्शन का स्थान नहीं, बल्कि साधना, तप और आस्था का केंद्र हैं। ऐसे में यहां की धार्मिक परंपराओं का पालन सर्वोपरि है। इसी सोच के तहत समिति ने प्रस्ताव तैयार किया है, जिसमें चारधाम के साथ उनसे जुड़े 48 मंदिरों, कुंडों और अन्य धार्मिक स्थलों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक लगाने की बात कही गई है। प्रस्तावित सूची में केदारनाथ और बदरीनाथ के अलावा तुंगनाथ, मदमहेश्वर, त्रियुगीनारायण, जोशीमठ का नरसिंह मंदिर, गुप्तकाशी का विश्वनाथ मंदिर, तप्त कुंड, ब्रह्मकपाल और शंकराचार्य समाधि जैसे प्रमुख स्थल शामिल हैं।
इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का भी बयान सामने आया है। मुख्यमंत्री ने कहा है कि देवभूमि उत्तराखंड में तीर्थ स्थलों का संचालन करने वाली संस्थाएं और संगठन जो भी निर्णय लेंगे, सरकार उनके मत के अनुसार आवश्यक कार्रवाई करेगी। उनके इस बयान से संकेत मिल रहे हैं कि राज्य सरकार इस विषय में मंदिर समितियों के निर्णय को अहमियत दे सकती है।
वहीं, इस प्रस्ताव को लेकर विपक्ष ने सवाल उठाए हैं। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता हरीश रावत ने कहा कि यदि कहीं प्रतिबंध लगाने की आवश्यकता है तो सरकार को स्पष्ट रूप से अपनी नीति सामने रखनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया भर में लोग अपने धर्म और संस्कृति को समझाने और दिखाने के लिए दूसरों को आमंत्रित करते हैं, लेकिन यहां इसके विपरीत माहौल बनाया जा रहा है। हरीश रावत ने यह भी सवाल उठाया कि जब देश में कई मंदिरों और कांवड़ यात्राओं में गैर-हिंदू भी योगदान देते रहे हैं, तो ऐसे प्रतिबंध समाज को किस दिशा में ले जाएंगे।
फिलहाल इस प्रस्ताव को लेकर संत समाज, राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों के बीच चर्चा तेज होती दिख रही है। जहां एक ओर इसे आस्था और परंपरा की रक्षा से जोड़कर समर्थन मिल रहा है, वहीं दूसरी ओर संविधान और समानता के अधिकार के नजरिए से भी इस पर सवाल उठाए जा रहे हैं। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर बहस और तेज होने की संभावना है।

Check Also

“पेपर क्राफ्ट वर्ल्ड” में नन्हे बच्चों की रचनात्मकता का अद्भुत प्रदर्शन

वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार लखनऊ। सेंट फ्रांसिस कॉलेज, हजरतगंज में कक्षा 1C और …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Live Updates COVID-19 CASES