वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार
दिल्ली। बसंत पंचमी को वसंत ऋतु के आगमन का पर्व माना जाता है और इस दिन पीले रंग का विशेष महत्व होता है। आमतौर पर यह पर्व मां सरस्वती की पूजा से जुड़ा है, लेकिन देश की राजधानी दिल्ली में स्थित हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर बसंत पंचमी एक अनोखी परंपरा के रूप में मनाई जाती है। यहां इस दिन पीले रंग की चादर चढ़ाई जाती है और दरगाह को पीले फूलों से सजाया जाता है। यह परंपरा लगभग 700 से 800 वर्ष पुरानी मानी जाती है।
बसंत पंचमी के अवसर पर निजामुद्दीन दरगाह पर हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। पीले फूलों की होली खेली जाती है और गंगा-जमुनी तहजीब की झलक देखने को मिलती है। आम दिनों में दरगाहों पर हरी चादर और गुलाब के फूल चढ़ाने की परंपरा होती है, लेकिन बसंत पंचमी पर यहां पीले रंग की चादर और गेंदे के फूल अर्पित किए जाते हैं।
इतिहासकारों के अनुसार इस परंपरा के पीछे एक भावनात्मक कथा जुड़ी है। कहा जाता है कि हजरत निजामुद्दीन औलिया अपने भांजे तकिउद्दीन से अत्यंत प्रेम करते थे। भांजे के निधन के बाद औलिया गहरे शोक में डूब गए और उदास रहने लगे। अपने गुरु की यह स्थिति देखकर उनके प्रिय शिष्य अमीर खुसरो चिंतित हो उठे। एक दिन उन्होंने पीले वस्त्र पहने महिलाओं को सरसों के फूलों के साथ उत्सव मनाते देखा और उनसे बसंत पंचमी के महत्व के बारे में जाना।
कहा जाता है कि अमीर खुसरो पीले वस्त्र पहनकर, सरसों के फूल लेकर हजरत निजामुद्दीन औलिया के पास पहुंचे और ‘सकल बन फूल रही सरसों’ गाते हुए नृत्य करने लगे। यह दृश्य देखकर औलिया के चेहरे पर मुस्कान लौट आई। तभी से निजामुद्दीन दरगाह पर बसंत पंचमी को पीले रंग और भाईचारे के प्रतीक के रूप में मनाने की परंपरा चली आ रही है।