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मेरे पिताजी विश्व की सबसे अच्छी “माँ” हैं

वेबवार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार वर्मा
शहर के एक प्रसिद्धि विद्यालय के बग़ीचे में तेज़ धूप और गर्मी की परवाह किये बिना, गंगादास बड़ी लग्न से पेड़-पौधों की काट छाँट में लगा था कि तभी विद्यालय के चपरासी की आवाज़ सुनाई दी, गंगादास, तुझे प्रधानाचार्या जी तुरंत बुला रही हैं। गंगादास को आख़िरी के पांँच शब्दों में काफ़ी तेज़ी महसूस हुई और उसे लगा कि कोई महत्त्वपूर्ण बात हुई है, जिसकी वज़ह से प्रधानाचार्या जी ने उसे तुरंत ही बुलाया है। वह शीघ्रता से उठा, अपने हाथों को धोकर साफ़ किया और चल दिया, द्रुत गति से प्रधानाचार्या के कार्यालय की ओर। उसे प्रधानाचार्या महोदया के कार्यालय की दूरी मीलों की लग रही थी जो ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी। उसकी हृदयगति बढ़ गई थी। सोच रहा था कि उससे क्या ग़लत हो गया जो आज उसको प्रधानाचार्या महोदया ने तुरंत ही अपने कार्यालय में आने को कहा।
वह एक ईमानदारऔर मेहनती कर्मचारी था और अपने कार्य को पूरी निष्ठा से पूर्ण करता था। पता नहीं क्या ग़लती हो गयी। वह इसी चिंता के साथ प्रधानाचार्या के कार्यालय पहुँचा……
“मैडमजी, क्या मैं अंदर आ जाऊँ ? आपने मुझे बुलाया था।”
“हाँ हाँ आओ, और यह देखो – प्रधानाचार्या महोदया की आवाज़ में कड़की थी और उनकी उंगली एक पेपर की ओर इशारा कर रही थी।
“पढ़ो इसे” प्रधानाचार्या ने आदेश दिया।
“मैं, मैं, मैडम! मैं तो इंग्लिश पढ़ना नहीं जानता मैडम!” गंगादास ने घबरा कर उत्तर दिया।
“मैं आपसे क्षमा चाहता हूँ मैडम यदि कोई गलती हो गयी हो तो। मैं आपका और विद्यालय का पहले से ही बहुत ऋणी हूँ। क्योंकि आपने मेरी बिटिया को इस विद्यालय में निःशुल्क पढ़ने की इज़ाज़त दी।
मुझे कृपया एक और मौक़ा दें, मेरी कोई ग़लती हुई है तो उसे सुधारने का। मैं आप का सदैव ऋणी रहूंँगा”……. गंगादास बिना रुके घबरा कर बोलता चला जा रहा था।
उसे प्रधानाचार्या ने टोका “तुम बिना वज़ह अनुमान लगा रहे हो। थोड़ा इंतज़ार करो, मैं तुम्हारी बिटिया की कक्षाध्यापिका को बुलाती हूँ।”
वे पल, जब तक उसकी बिटिया की कक्षा-अध्यापिका प्रधानाचार्या के कार्यालय में पहुँची, बहुत ही लंबे हो गए थे गंगादास के लिए। सोच रहा था कि क्या उसकी बिटिया से कोई ग़लती हो गयी, कहीं मैडम उसे विद्यालय से निकाल तो नहीं रहीं। उसकी चिंता और बढ़ गयी थी।
कक्षा-अध्यापिका के पहुँचते ही प्रधानाचार्या महोदया ने कहा, “हमने तुम्हारी बिटिया की प्रतिभा को देखकर और परख कर ही उसे अपने विद्यालय में पढ़ने की अनुमति दी थी। अब ये मैडम इस पेपर में जो लिखा है उसे पढ़कर और हिंदी में तुम्हें सुनाएँगी, ग़ौर से सुनो।”
कक्षा-अध्यापिका ने पेपर को पढ़ना शुरू करने से पहले बताया, “आज मातृ दिवस था और आज मैंने कक्षा में सभी बच्चों को अपनी अपनी माँ के बारे में एक लेख लिखने को कहा था। तुम्हारी बिटिया ने जो लिखा उसे सुनो……..”
…………उसके बाद कक्षा-अध्यापिका ने पेपर पढ़ना शुरू किया।
“मैं एक गाँव में रहती थी, एक ऐसा गाँव जहाँ शिक्षा और चिकित्सा की सुविधाओं का आज भी अभाव है। चिकित्सा सुविधाओं के अभाव में कितनी ही माँऐं दम तोड़ देती हैं ,बच्चों को जन्म देते समय। मेरी माँ भी उनमें से एक थीं। उन्होंने मुझे छुआ भी नहीं कि चल बसीं। मेरे पिता ही पहले व्यक्ति थे, मेरे परिवार के, जिन्होंने मुझे गोद में लिया। पर सच कहूँ तो मेरे परिवार के वे अकेले व्यक्ति थे जिन्होंने मुझे गोद में उठाया था। बाक़ी की नज़रों में तो मैं अपनी माँ को पैदा होते ही खा गई थी। मेरे पिताजी ने ही मुझे माँ का प्यार दिया।
मेरे दादा-दादी चाहते थे कि मेरे पिताजी दुबारा विवाह करके एक पोते को इस दुनियाँ में लायें ताकि उनका वंश आगे चल सके। परंतु मेरे पिताजी ने उनकी एक न सुनी और दुबारा अपना विवाह करने से स्पष्ट मना कर दिया। इस वज़ह से नाराज़ होकर मेरे दादा-दादी जी ने उनको अपने से अलग कर दिया और पिताजी अपना सब कुछ, ज़मीन, खेती बाड़ी, घर सुविधा आदि छोड़ कर मुझे साथ लेकर शहर चले आये और इसी विद्यालय में माली का कार्य करने लगे। मुझे बहुत ही लाड़ प्यार से पाल-पोस कर बड़ा करने लगे। मेरी छोटी-बड़ी सारी ज़रूरतों पर माँ की तरह हर पल उनका ध्यान रहता है।
“आज मुझे समझ आता है कि वे क्यों हर उस चीज़ को, जो मुझे पसंद थी, ये कह कर खाने से मना कर देते थे कि वह उन्हें पसंद नहीं है, आज मुझे बड़ा होने पर उनके इस त्याग के महत्त्व पता चला।”
“मेरे पिता ने अपनी क्षमताओं में मेरी हर प्रकार की सुख-सुविधाओं का हमेशा पूरा ध्यान रखा। मेरे विद्यालय ने उनकी ईमानदारीऔर कर्मठता का उनको यह सबसे बड़ा पुरस्कार दिया जो मुझे यहाँ निःशुल्क पढ़ने की अनुमति मिली। उस दिन मेरे पिता की ख़ुशी का कोई ठिकाना न था।”
“यदि माँ, प्यार और देखभाल करने का नाम है तो मेरी माँ मेरे पिताजी हैं।”
यदि दयाभाव, “माँ” को परिभाषित करता है तो मेरे पिताजी उस परिभाषा के हिसाब से पूरी तरह मेरी माँ हैं। यदि त्याग “माँ” को परिभाषित करता है तो मेरे पिताजी इस वर्ग में भी सर्वोच्च स्थान पर हैं।”
संक्षेप में कहूँ कि यदि प्यार, देखभाल, दयाभाव और त्याग माँ की पहचान हैं तो मेरे पिताजी उस पहचान पर पूरी तरह खरे उतरते हैं और मेरे पिताजी विश्व की सबसे अच्छी “माँ” हैं।
आज मातृ दिवस पर मैं अपने पिताजी को ढेरों शुभकामनाएँ दूँगी और यही कहूँगी कि…….. पिताजी,आप संसार के सबसे अच्छे पालक हैं। बहुत गर्व से कहूँगी कि ये जो हमारे विद्यालय के परिश्रमी माली हैं, मेरे पिता हैं।”
“मैं जानती हूँ कि मैं आज की लेखन परीक्षा में असफल हो जाऊँगी। क्योंकि मुझे माँ पर लेख लिखना था और मैंने पिता पर लिखा। परन्तु यह बहुत ही छोटी सी क़ीमत होगी उस सब की जो मेरे पिता ने मेरे लिए किया।
” धन्यवाद “
आख़िरी शब्द पढ़ते-पढ़ते अध्यापिका का गला भर आया था और प्रधानाचार्या के कार्यालय में शांति छा गयी थी। इस शांति में केवल और केवल गंगादास के सिसकने की आवाज़ सुनाई दे रही थी। बग़ीचे में धूप की गर्मी उसकी कमीज़ को गीला न कर सकी पर उस पेपर पर बिटिया के लिखे शब्दों ने उस कमीज़ को पिता के आँसुओं से गीला कर दिया था। वह केवल हाथ जोड़ कर वहाँ खड़ा सिसक रहा था, अपनी बेटी को याद कर रहा था।
गंगादास ने उस पेपर को अध्यापिका से लिया, अपने हृदय से लगाया और रो पड़ा।
प्रधानाचार्या ने खड़े होकर उसे एक कुर्सी पर बैठाया और एक गिलास पानी दिया तथा कहा……, गंगादास तुम्हारी बिटिया को इस लेख के लिए पूरे 10/10 नम्बर दिए गए है। यह लेख मेरे अब तक के पूरे विद्यालय जीवन का सबसे अच्छा मातृ दिवस पर लिखा लेख है। हम कल मातृ दिवस को अपने विद्यालय में बड़े ज़ोर – शोर से मना रहे हैं। इस दिवस पर विद्यालय एक बहुत बड़ा कार्यक्रम आयोजित करने जा रहा है। विद्यालय की प्रबंधक कमेटी ने “आपको ” इस कार्यक्रम का “मुख्य अतिथि” बनाने का निर्णय लिया है। यह सम्मान होगा उस प्यार, देखभाल, दयाभाव और त्याग का जो एक आदमी अपने बच्चे के पालन के लिए कर सकता है। यह सिद्ध करता है कि एक पालक बनने के लिए एक औरत होना आवश्यक नहीं है। साथ ही यह अनुशंसा करता है उस विश्वास का जो विश्वास आपकी बेटी ने आप पर दिखाया। हमें गर्व है कि संसार का सबसे अच्छा “पिता” हमारे विद्यालय में पढ़ने वाली बच्ची का पिता है जैसा कि आपकी बिटिया ने अपने लेख में लिखा। गंगादास हमें गर्व है कि आप इस विद्यालय में माली हैं और आपने सच्चे अर्थों में माली की तरह न केवल विद्यालय के बग़ीचे के पेड़-पौधों व फूलों की देखभाल की बल्कि अपने इस घर के फूल को भी सदा ख़ुशबूदार बनाकर रखा जिसकी ख़ुशबू से हमारा विद्यालय महक उठा।
तो क्या आप हमारे विद्यालय के इस मातृ दिवस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि बनेंगे ?” ……ये सुनकर रो पड़ा “गंगादास” और दौड़ कर बिटिया की कक्षा के बाहर से आँसू भरी आँखों से निहारता रहा, “अपनी प्यारी बिटिया” को………। संसार की समस्त प्यारी – प्यारी बेटियों के पालकों को समर्पित l

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