वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार
नई दिल्ली। प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव डॉ. पी. के. मिश्रा ने कहा कि तेजी से बदलते वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में भारत की आर्थिक मजबूती घरेलू क्षमता, विविधीकरण और खुलेपन के संतुलन में निहित है। नई दिल्ली में आयोजित पांचवें कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव में ‘जोखिम की कीमत चुकाती दुनिया’ विषयक सत्र को संबोधित करते हुए उन्होंने आर्थिक लचीलेपन और रणनीतिक तैयारी को समय की आवश्यकता बताया।
डॉ. मिश्रा ने कहा कि वैश्विक अर्थव्यवस्था अब केवल अनुमानित जोखिमों से नहीं, बल्कि ऐसी अनिश्चितताओं से भी जूझ रही है, जिनकी संभावनाओं का विश्वसनीय आकलन कठिन है। महामारी, भू-राजनीतिक संघर्ष, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान, व्यापार प्रतिबंध और तकनीकी बदलावों ने आर्थिक जोखिम की प्रकृति को बदल दिया है।
उन्होंने कहा कि समुद्री मार्गों में व्यवधान हजारों किलोमीटर दूर ऊर्जा कीमतों को प्रभावित कर सकता है। वहीं महत्वपूर्ण खनिजों और उनके प्रसंस्करण का कुछ क्षेत्रों में केंद्रीकरण नई कमजोरियां पैदा कर रहा है। स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ते संक्रमण के साथ रणनीतिक निर्भरता के नए रूप भी सामने आ रहे हैं। प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव ने कहा कि कंपनियां आपूर्तिकर्ताओं में विविधता, भंडार और वैकल्पिक उत्पादन क्षमता पर जोर दे रही हैं। सरकारें भी राजकोषीय बफर और रणनीतिक क्षमताओं को मजबूत कर रही हैं। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि लचीलापन मुफ्त नहीं होता और इसके लिए किए जाने वाले अतिरिक्त खर्च को संभावित नुकसान के संदर्भ में देखना जरूरी है।
भारत की रणनीति का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि लचीलापन दुनिया से अलगाव नहीं, बल्कि ऐसी क्षमता है जिससे देश वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए खुला रहते हुए अत्यधिक निर्भरता से बच सके। उन्होंने ऊर्जा सुरक्षा, महत्वपूर्ण खनिज, रणनीतिक उद्योग और विविध अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को महत्वपूर्ण बताया।
डॉ. मिश्रा ने कहा कि घरेलू क्षमता का निर्माण प्रतिस्पर्धात्मकता और उत्पादकता के साथ होना चाहिए। इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर और फार्मास्यूटिकल्स जैसे क्षेत्रों में मजबूत क्षमताएं विकसित करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भरता का अर्थ दुनिया के लिए दरवाजे बंद करना नहीं, बल्कि अपनी क्षमताओं को मजबूत करते हुए वैश्विक अवसरों से जुड़ना है।