वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार
लखनऊ। संस्कृति विभाग के अंतर्गत राज्य संग्रहालय, लखनऊ में आयोजित डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल स्मृति व्याख्यानमाला के तहत “वल्लभी की मंदिर वास्तुकला” विषय पर व्याख्यान आयोजित किया गया। कार्यक्रम में भारतीय कला, इतिहास, पुरातत्व, स्थापत्य और संस्कृति से जुड़े विद्वानों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों तथा संस्कृति प्रेमियों ने बड़ी संख्या में सहभागिता की। व्याख्यान में भारतीय मंदिर स्थापत्य की प्राचीन परंपराओं और उनके सांस्कृतिक महत्व पर विस्तार से चर्चा की गई।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के सेवानिवृत्त महानिदेशक डॉ. राकेश तिवारी ने पावरप्वाइंट प्रस्तुति के माध्यम से वल्लभी शैली की विशेषताओं, ऐतिहासिक विकास और भारतीय मंदिर निर्माण पर उसके प्रभाव की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि भारतीय मंदिर वास्तुकला का विकास एक सतत प्रक्रिया का परिणाम है, जिसमें विभिन्न क्षेत्रीय शैलियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। वल्लभी शैली अपनी विशिष्ट आयताकार योजना और बैरल-वॉल्ट अर्थात गजपृष्ठाकार छत के कारण अलग पहचान रखती है।
डॉ. तिवारी ने कहा कि गुप्तकाल के बाद इस शैली का व्यापक विकास हुआ और मध्य भारत, राजस्थान तथा उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में इसके उत्कृष्ट उदाहरण देखने को मिलते हैं। उन्होंने विभिन्न पुरातात्विक स्थलों के चित्रों के माध्यम से बताया कि वल्लभी शैली ने बाद में विकसित नागर मंदिर स्थापत्य को भी प्रभावित किया। उन्होंने कहा कि भारतीय मंदिर केवल पूजा-अर्चना के केंद्र नहीं रहे, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और कलात्मक गतिविधियों के भी महत्वपूर्ण केंद्र थे।
राज्य संग्रहालय के निदेशक डॉ. विनय कुमार सिंह ने मुख्य वक्ता का स्वागत करते हुए कहा कि डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल ने भारतीय कला, संस्कृति और इतिहास की व्याख्या को नई दृष्टि प्रदान की। उन्होंने कहा कि ऐसी व्याख्यानमालाएं नई पीढ़ी को भारतीय सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने और उसके संरक्षण के प्रति जागरूक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।