वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार
लखनऊ। किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग की ओर से 8 और 9 अगस्त को शताब्दी चिकित्सालय फेज-2 में दो दिवसीय पीएच समिट 2026 का आयोजन किया जाएगा। समिट में देश-विदेश के विशेषज्ञ पल्मोनरी हाइपरटेंशन (PH) की समय पर पहचान, आधुनिक उपचार और इस क्षेत्र में हुए नए शोध पर चर्चा करेंगे। विभागाध्यक्ष प्रो. वेद प्रकाश ने बताया कि समिट का उद्देश्य नवीन वैज्ञानिक शोध को मरीजों के बेहतर इलाज तक पहुंचाना है, ताकि चिकित्सकों को इस गंभीर बीमारी के प्रभावी प्रबंधन में मदद मिल सके।
प्रो. वेद प्रकाश ने बताया कि पल्मोनरी हाइपरटेंशन का पता अक्सर देर से चलता है, क्योंकि शुरुआती लक्षण सामान्य बीमारियों जैसे सांस फूलना, थकान और सीने में दर्द से मिलते-जुलते हैं। अधिकांश मरीजों में बीमारी का पता तब चलता है, जब वह गंभीर अवस्था में पहुंच चुकी होती है। ऐसे मामलों में हार्ट-लंग ट्रांसप्लांट ही अंतिम उपचार का विकल्प बचता है। उन्होंने कहा कि समय रहते पहचान और उपचार शुरू होने से मरीजों की जीवन गुणवत्ता और जीवित रहने की संभावना में उल्लेखनीय सुधार संभव है।
उन्होंने बताया कि उपलब्ध अध्ययनों के अनुसार लक्षण शुरू होने और बीमारी की पुष्टि होने के बीच औसतन डेढ़ से दो वर्ष का अंतर रहता है। बिना उपचार के पल्मोनरी आर्टेरियल हाइपरटेंशन के मरीजों की औसत जीवित रहने की अवधि तीन वर्ष से भी कम हो सकती है। बीमारी बढ़ने पर उपचार का खर्च भी प्रतिवर्ष लाखों रुपये तक पहुंच सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार पल्मोनरी हाइपरटेंशन फेफड़ों की रक्त वाहिकाओं में बढ़े हुए दबाव के कारण होने वाली गंभीर बीमारी है, जिसमें हृदय को फेफड़ों तक रक्त पहुंचाने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ती है। सांस फूलना, चक्कर आना, थकान और सीने में दर्द इसके प्रमुख लक्षण हैं। चिकित्सकों ने लोगों से इन लक्षणों को नजरअंदाज न करने और समय पर विशेषज्ञ से परामर्श लेने की अपील की है।