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लखनऊ की नवाबी भाषा सीखना चाहता हूं” : पेनपा त्सेरिंग, राष्ट्रपति, तिब्बत

– नवाबी तहज़ीब की छांव में तिब्बत का संदेश
– एस आर ग्रुप ऑफ़ इंस्टिट्यूशन में ‘पर्यावरण और सुरक्षा’ पर हुआ विशेष तिब्बतन अवेयरनेस टॉक
वेब वार्ता ( न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार
लखनऊ । लखनऊ की संस्कृति का आकर्षण हमेशा से अपने मेहमानों के दिल को छूता आया है, और यही एहसास तिब्बत के राष्ट्रपति पेनपा त्सेरिंग के शब्दों में भी झलक उठा जब उन्होंने कहा कि वे लखनऊ की नवाबी भाषा सीखना चाहते हैं। एस आर ग्रुप ऑफ़ इंस्टिट्यूशन में आयोजित ‘तिब्बतन अवेयरनेस टॉक – पर्यावरण और सुरक्षा’ का यह क्षण न केवल भावुक था, बल्कि भारत–तिब्बत के मधुर संबंधों की एक गहरी तस्वीर भी प्रस्तुत करता था।
बीकेटी स्थित एस आर ग्रुप ऑफ़ इंस्टिट्यूशन में सोमवार को ‘तिब्बतन अवेयरनेस टॉक – पर्यावरण और सुरक्षा’ विषय पर एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत गणपति वंदना और तिब्बती नृत्य से हुई, जिसने मंच को अध्यात्म और संस्कृति की एकजुटता से भर दिया। पेनपा त्सेरिंग ने पर्यावरण और सुरक्षा को इस सदी की सबसे बड़ी चुनौतियाँ बताते हुए तिब्बत और भारत के रिश्तों का ऐतिहासिक और आध्यात्मिक आधार बड़े सरल लेकिन प्रभावी ढंग से समझाया। उनके शब्दों में तिब्बत की सांस्कृतिक जड़ें भारत के ज्ञान और परंपरा में गहराई से समाई हुई हैं—और यही दोनों देशों के बीच विश्वास की असली ताकत है। छात्रों को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति पेनपा त्सेरिंग ने कहा कि पर्यावरण और सुरक्षा 21वीं सदी का सबसे बड़ा वैश्विक मुद्दा बन चुका है। भारत दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश बन चूका है। लखनऊ सहित पूरे उत्तर प्रदेश में पर्यावरणीय चुनौतियाँ जैसे जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, वन कटाई और जल संकट—सीधे हमारी सुरक्षा और जीवन को प्रभावित कर रही हैं। उन्होंने तिब्बत की स्थिति और भारत-तिब्बत संबंधों पर विस्तार से बात करते हुए कहा कि “तिब्बती भाषा, भारत की देवनागरी से प्रेरित है—यह हमारे सदियों पुराने रिश्ते को साबित करती है।” “तिब्बत में 46,000 ग्लेशियर हैं, जिसे कम लोग जानते हैं।” “भारत हमेशा तिब्बत का गुरु रहा है और तिब्बत उसका चेला।” “आज तिब्बत जो भी है, वह भारत की वजह से है।” उन्होंने यह भी कहा कि चीन द्वारा बनाए गए प्रतिबंधों के कारण आज तिब्बत जाने और वहाँ से आने वालों पर कई तरह के अवरोध लगाए जा रहे हैं।
उन्होंने भारत को “दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश” बताते हुए कहा कि भारत को बस अपनी ही शक्ति का स्मरण करना है, जैसे हनुमान जी को कराया गया था। यह संदेश उपस्थित विद्यार्थियों और शिक्षकों के भीतर आत्मविश्वास जगाने वाला था। वहीं, भारत–तिब्बत संबंधों पर आए प्रतिबंधों और तिब्बत की स्वतंत्रता से जुड़े प्रश्नों ने कार्यक्रम को गंभीर चिंतन की दिशा में भी मोड़ा।
इस अवसर पर एसआरजीआई के चेयरमैन एवं एमएलसी पवन सिंह चौहान, भारत-तिब्बत संवाद के ऑल इंडिया कोऑर्डिनेटर डॉ. संजय मिश्रा, वाईस चेयरपर्सन सुष्मिता सिंह, वाईस चेयरमैन पीयूष सिंह चौहान सहित अन्य गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे। समापन पर एसआरजीआई परिवार द्वारा व्यक्त आभार ने इस आयोजन को एक सहज, गरिमामय और सार्थक समापन दिया। यह कार्यक्रम सिर्फ एक भाषण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सांस्कृतिक सम्मान, पर्यावरणीय चेतना और वैश्विक सुरक्षा के साझा विचारों को एक ही मंच पर जोड़ देने वाला महत्त्वपूर्ण अनुभव बन गया।

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