वेब वार्ता ( न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार
लखनऊ । मेनिन्जाइटिस की चर्चा हमेशा मन में एक अनजाना भय भर देती है। यह बीमारी अचानक आती है, तेज़ी से बढ़ती है और अक्सर देर से पहचान में आती है। कई परिवारों ने इसे करीब से देखा है—सामान्य बुखार समझकर अनदेखा किया, लेकिन बाद में पता चला कि यह बच्चों के लिए जानलेवा साबित होने वाला ब्रेन फीवर था। ऐसे ही अनुभवों ने मुझे हमेशा यह सोचने पर मजबूर किया कि जागरूकता ही वह एकमात्र शक्ति है, जो इस बीमारी से लड़ने का साहस देती है।
डॉ. आशुतोष वर्मा, पीडियाट्रिशियन, चिल्ड्रेन मेडिकल सेंटर, डालीगंज, लखनऊ बताते हैं कि “मेनिन्जाइटिस के लक्षण अक्सर सामान्य बीमारियों जैसे लगते हैं, जिससे परिवार सतर्क नहीं हो पाते। डॉक्टरों की बातों में बार-बार यही चेतावनी सुनाई देती है कि मेनिन्जाइटिस के शुरुआती लक्षण सामान्य सर्दी-जुकाम से अलग पहचानना मुश्किल होता है। गर्दन में अकड़न, तेज बुखार या उलझन जैसे संकेत तब तक गंभीर रूप ले लेते हैं, जब तक परिवार समझ पाता है कि समस्या क्या है। ऐसे कई मामलों को देखकर महसूस होता है कि टीकाकरण ही वह ढाल है, जो बच्चों की मासूम जिंदगी को इस खतरे से बचा सकता है।
जब पता चलता है कि दुनिया में हर साल लाखों बच्चे मेनिन्जाइटिस का शिकार बनते हैं और भारत इस बीमारी से होने वाली मौतों में शीर्ष देशों में शामिल है, तो चिंता और भी गहरी हो जाती है। पर इसी चिंता ने एक दिशा भी दिखाई—समय पर टीकाकरण और सतर्कता। यह सोचकर सुकून मिलता है कि एक छोटा-सा टीका बड़े खतरे को टाल सकता है।
हर माता-पिता की तरह मेरे मन में भी यह विश्वास है कि जागरूक समाज ही सुरक्षित भविष्य बना सकता है। आज जब सरकार, डॉक्टर और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं जागरूकता बढ़ाने में जुटी हैं, तो हमारी भी जिम्मेदारी है कि हम इस प्रयास का हिस्सा बनें। क्योंकि बच्चों की सुरक्षा का सफर यहीं से शुरू होता है—समझ से, सतर्कता से और टीकाकरण से।