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क्या सचमुच माता-पिता बोझ होते हैं, या हमारी संवेदनाएं ही बूढ़ी हो गई हैं ? चार दिन फ्रीजर में लाश रखवा दो…

– चार दिन फ्रीजर में लाश रखवा दो, शादी के बाद आकर दाह संस्कार करवा दूंगा।
– कहने को 3 बेटे…वृद्धाश्रम में बीता आखिरी वक्त,
– सांसें थमने पर मां को आग भी नसीब नहीं, फूट-फूटकर रोया बाप
वेब वार्ता ( न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार
गोरखपुर / जौनपुर। गोरखपुर के कैंपियरगंज इलाके के रहने वाले भुआल और शोभा के तीन बेटे हुए। दंपती ने खून-पसीना बहाकर बेटों को पाल-पोसकर बड़ा किया। बेटे बड़े हुए तो मां-बाप बोझ बन गए और बेटों की बदसलूकी से आहत होकर मां-बाप ने घर छोड़ दिया और जौनपुर के वृद्धाश्रम में शरण ली। मां शोभा की मौत के बाद बेटे ने अपने बेटे की शादी का हवाला देते हुए दाह संस्कार से मना कर दिया। मां का शव जौनपुर से गांव तक लाए जाने के बाद दहलीज तक नहीं ले जाया जा सका और न ही मुखाग्नि नसीब हुई। रिश्तेदारों की मदद से शव करमैनीघाट पर दफना दिया गया।
जीवन के संध्या काल में मां-बाप की सबसे बड़ी चाहत होती है कि उनके बच्चे उनका सहारा बनें, उनका अंतिम सफर सहज और सम्मानपूर्ण हो। मगर गोरखपुर के बुजुर्ग दंपती भुआल और शोभा की कहानी इस उम्मीद के ठीक उलट एक कड़वी हकीकत का संस्मरण बन गई। तीन-तीन बेटों के होते हुए भी शोभा को अपने आखिरी दिनों में न प्यार मिला, न साथ, और न ही विदाई का वह सम्मान, जिसकी हर मां हकदार होती है। भरोहियां ग्राम पंचायत में पली-बढ़ी इस दंपती ने तीन बेटों को अपनी मेहनत और त्याग से बड़ा किया। जब बूढ़े हुए, तो वही बेटे बोझ लगने लगे। बड़े बेटे की ताने-बदसलूकी ने उन्हें इतना आहत किया कि वे घर छोड़कर कभी अयोध्या, कभी मथुरा और अंततः जौनपुर के वृद्धाश्रम की शरण में जा पहुंचे। यहां मिली शांति भी ज्यादा दिनों तक साथ न रही। शोभा बीमार हुईं, लकवे ने शरीर तोड़ा और फिर 19 नवंबर की रात अस्पताल में उनकी सांसें थम गईं।
दुख की घड़ी में बेटे का सहारा मिलना तो दूर, जब वृद्धाश्रम से बेटे को खबर दी गई, तो उसने अपनी मां के शव को लेने से ही इनकार कर दिया। शादी का हवाला देकर शव को फ्रीजर में रखवाने की बात कही। यह सुनकर पिता भुआल की आंखों में ठहर गया दर्द ही बोल रहा था, जब वे उम्मीद में छोटे बेटे का नंबर देते रहे कि शायद वह मां को घर ले जाएगा। मगर गांव पहुंचने पर बड़ा बेटा अपशकुन बताकर शव को दहलीज तक आने नहीं देता। हिंदू रीति से अंतिम संस्कार का हक भी शोभा से छिन जाता है और रिश्तेदारों की मदद से पिता अपनी पत्नी को मिट्टी में दफना देते हैं।
यह केवल एक परिवार की कहानी नहीं, यह उस टूटते सामाजिक ताने-बाने का आईना है जहां वृद्ध होते माता-पिता धीरे-धीरे अकेले छोड़ दिए जाते हैं। जहां शादी की खुशियों में मां की मृत्यु अशुभ हो जाती है और जहां जिम्मेदारी से बचना परंपरा से बड़ा हो जाता है। भुआल अब पुरोहित की सलाह पर आटे का पुतला बनाकर विधि कराने की सोच रहे हैं, शायद उनकी आत्मा को कुछ शांति मिले। मगर सवाल अभी भी हवा में है—क्या सचमुच माता-पिता बोझ होते हैं, या हमारी संवेदनाएं ही बूढ़ी हो गई हैं?

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