– शंकराचार्य की आपत्ति से समारोह में आस्था और शास्त्र की बहस
– ध्वजारोहण में शंकराचार्यों को न्योता नहीं
वेब वार्ता ( न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार
वाराणसी। अयोध्या में राम मंदिर के शिखर पर धर्मध्वजा फहराए जाने के ऐतिहासिक क्षण ने पूरे देश को उत्साह और आस्था से भर दिया, लेकिन इसी बीच उठी एक बहस ने आध्यात्मिक परंपराओं के स्वर को भी केंद्र में ला खड़ा किया। प्रधानमंत्री द्वारा ध्वजारोहण किए जाने के बाद जहां लाखों लोगों ने इसे एक भावनात्मक उपलब्धि के रूप में देखा, वहीं कुछ आवाज़ें परंपरा और शास्त्रों की कसौटी पर इस आयोजन की समीक्षा करती रहीं। इन्हीं आवाज़ों में प्रमुख थे ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती, जिनकी टिप्पणी ने इस समारोह को एक नए विमर्श की ओर मोड़ दिया।
वाराणसी में उन्होंने कहा कि शास्त्रों में ‘ध्वजारोहण’ जैसी किसी अलग प्रक्रिया का उल्लेख नहीं मिलता। उनके अनुसार किसी भी मंदिर में ध्वजा तभी स्थापित या बदली जाती है जब शिखर की विधिवत प्रतिष्ठा हो चुकी हो। उनके शब्दों में एक तीखी पीड़ा भी झलकती थी—यह पीड़ा परंपरा की उस निरंतरता के टूटने की, जिसे वे सदियों से अखंड मानते आए। उनका कहना था कि जब तक धार्मिक कार्य शास्त्रीय विधि से न हों, तब तक वे उनमें भागीदारी का अर्थ नहीं देखते।
शंकराचार्य का यह कहना कि जगन्नाथ और द्वारका जैसे प्राचीन तीर्थों में भी ध्वजा सीधे ऊपर चढ़ाकर फहराने की परंपरा नहीं है, बल्कि ध्वज वाहक स्वयं शिखर पर चढ़कर इसे स्थापित करता है, कई लोगों को सोचने पर मजबूर कर गया। जिस वीडियो का उल्लेख उन्होंने किया, उसमें ट्रस्ट के सदस्यों द्वारा ‘ध्वजारोहण’ शब्द का प्रयोग उन्हें और भी असहज कर गया।
दूसरी ओर, ट्रस्ट द्वारा उन 100 दानदाताओं को आमंत्रित करना जिन्होंने मंदिर निर्माण में दो करोड़ से अधिक राशि दी है, यह दर्शाता है कि आयोजन के पीछे आधुनिक प्रबंधन, कृतज्ञता और सामाजिक सहभागिता की भावना भी काम कर रही थी। परंपरा और आधुनिकता के इस संगम में कहीं न कहीं यह अपेक्षित था कि कुछ प्रश्न उठेंगे, कुछ मतभेद प्रकट होंगे।
इस पूरे घटनाक्रम को स्मरण करते हुए यह महसूस होता है कि अयोध्या की भूमि केवल आस्था की नहीं, संवाद और विमर्श की भी भूमि है। धर्मध्वजा फहराने का क्षण चाहे जितना दिव्य रहा हो, परंपरा की व्याख्या को लेकर उत्पन्न बहस हमें याद दिलाती है कि भारत की आध्यात्मिक यात्रा हमेशा अनेक दृष्टिकोणों, मतों और परंपराओं का मेल रही है। यही विविधता इसे जीवंत बनाती है, और यही विविधता हमें हर बड़े समारोह में नए प्रश्नों और नए उत्तरों की दिशा में आगे बढ़ाती है।