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“बेडू पाको बारामासा”, “फुलदेई छम्मा छम्मा”, “छोड़ दे दैय्या बासंती”, “म्यर पहाड़”, “झुमका गिरा रै नैनीताल मा” और “घुघूती बसूती” की धुनों पर झूमी डांडिया

– उत्तराखण्ड की लोकधुनों ने युवाओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ा
– उत्तराखण्ड महोत्सव-2025 की पूर्व संध्या पर “कॉंफव डांडिया नाइट” में गूंजे पहाड़ी गीत
वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/अजय कुमार
लखनऊ। उत्तराखण्ड महोत्सव-2025 की पूर्व संध्या पर उत्तराखण्ड महापरिषद, लखनऊ द्वारा पंडित गोविंद बल्लभ पंत सांस्कृतिक उपवन में एक भव्य एवं उल्लासपूर्ण “कॉंफव डांडिया नाइट” का आयोजन किया गया। इस रंगारंग शाम में उत्तराखण्ड की पारंपरिक संस्कृति, लोकसंगीत और नृत्य की अद्भुत झलक देखने को मिली।
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन और “जय बद्री विशाल” के उद्घोष के साथ हुआ। इसके बाद “बेडू पाको बारामासा”, “फुलदेई छम्मा छम्मा”, “छोड़ दे दैय्या बासंती”, “म्यर पहाड़”, “झुमका गिरा रै नैनीताल मा” और “घुघूती बसूती” जैसे लोकप्रिय पहाड़ी गीतों की धुनों पर पारंपरिक डांडिया नृत्य प्रस्तुत किया गया। छड़ियों की झंकार और सुरों की गूंज से पूरा वातावरण उत्सवमय हो उठा।
महिलाओं, युवाओं और वरिष्ठ नागरिकों ने बड़ी संख्या में भाग लिया। विशेष रूप से श्रीमती पुष्पा वैष्णव, हेमा बिष्ट, शशि जोशी, हरितिमा पंत, पूनम कंवल, देवश्री पंवार, सुनीता रावत, कमला चुफ़ाल, मनीषा चिलवाल, शोभा रावत आदि की ऊर्जावान भागीदारी ने कार्यक्रम को जीवंत बना दिया। वहीं जगत सिंह राणा, पूरन सिंह जीना, भारत सिंह बिष्ट, महेन्द्र गैलाॅकोटी, राजेश बिष्ट, पान सिंह, कैलाश सिंह, रमेश अधिकारी, चंद्रमोहन जोशी, पंकज खर्कवाल सहित अनेक गणमान्य उपस्थित रहे और अपने उत्साह से माहौल को और भी खुशनुमा बना दिया। कल्याणपुर, कुमाउँांचल नगर, पंतनगर, तेलीबाग, गोमतीनगर और अलीगंज से आए लोक कलाकारों ने ढोल-दमाऊं, हुड़का और रणभेरी की थाप पर प्रस्तुतियों से सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया।
महापरिषद के पदाधिकारियों ने बताया कि “डांडिया नाइट” का उद्देश्य उत्तराखण्ड की लोकधुनों को आधुनिक मंच पर प्रस्तुत करते हुए युवाओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना है। यह आयोजन उत्तराखण्डी अस्मिता और एकता का प्रतीक रहा। रंग, संगीत और उल्लास से भरी यह शाम मध्यरात्रि तक चलती रही। सामूहिक प्रस्तुति “घुघूती बसूती” के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। यह डांडिया नाइट आगामी “उत्तराखण्ड महोत्सव-2025” (9 से 18 नवम्बर 2025) की सांस्कृतिक प्रस्तावना के रूप में आयोजित की गई, जिसने लखनऊ के सांस्कृतिक परिदृश्य में उत्तराखण्ड की लोकधुनों का जादू बिखेर दिया।

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