सहलेखन का प्रतिमान आज,
उद्धोषक शाश्वत संघ-मर्म।
शाब्दिक मर्यादा मापदण्ड,
जन-जन में ‘अपना-राष्ट्रधर्म’।।
वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार
लखनऊ। राष्ट्रधर्म पत्रिका भारतीय समाज में हिंदू संस्कृति और राष्ट्रीयता के प्रचार-प्रसार का एक अद्वितीय माध्यम रही है। स्वतंत्रता के ठीक बाद 31 अगस्त 1947 को भाऊराव देवरस, नानाजी देशमुख और दीनदयाल उपाध्याय की योजना से इसका प्रथम अंक प्रकाशित हुआ। इसमें दीनदयाल जी का आलेख ‘चिति’ और अटल बिहारी वाजपेयी की कविता ‘हिंदू तन मन हिंदू जीवन रग-रग हिन्दू मेरा परिचय’ प्रकाशित हुई थी। इस पत्रिका के प्रतीक चिन्ह में विष्णु स्वरूप पीपल का पत्ता, ऊपर की नोक पर ‘राष्ट्र-धर्म’, बीच में महर्षि वेद व्यास और नीचे ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ लिखा गया, जो इसके आदर्श और लक्ष्य को स्पष्ट करता है।
राष्ट्रधर्म प्रकाशन लिमिटेड की स्थापना कानपुर में बैरिस्टर नरेंद्रजीत सिंह की अध्यक्षता में हुई। इसके प्रथम निदेशक दीनदयाल उपाध्याय थे, जिनके बाद नानाजी देशमुख, प्रो. राजेंद्र सिंह ‘रज्जू भैया’, भाऊराव देवरस और श्रीकृष्ण दास जैसे यशस्वी प्रचारकों ने पत्रिका को मार्गदर्शन दिया। अटल बिहारी वाजपेयी और राजीवलोचन अग्निहोत्री इसके संयुक्त प्रथम संपादक थे। इसके बाद भानु प्रताप शुक्ल, वचनेश त्रिपाठी, रामशंकर अग्निहोत्री, वीरेश्वर द्विवेदी और आनंद मिश्र ‘अभय’ जैसे प्रख्यात संपादकों ने पत्रिका को समय-समय पर दिशा दी।
शुरुआती दिनों में दीनदयाल जी स्वयं रातभर प्रेस मशीन चला कर पत्रिका का प्रकाशन सुनिश्चित करते थे। अटल जी स्वयं अंक सायकिल से वितरित करते थे और प्रेस में कार्यरत कर्मचारियों की कठिनाइयों को साझा करते थे। समय के साथ राष्ट्रधर्म ने अनेक चर्चित विशेषांक प्रकाशित किए, जिनमें विश्वव्यापी हिंदू संस्कृति, दीनदयाल उपाध्याय, हमारे अटलजी, आंतरिक सुरक्षा, श्रीराम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा, विकसित भारत और महाकुम्भ जैसे विषय शामिल हैं।
आज, राष्ट्रधर्म पत्रिका न केवल संघ की शताब्दी यात्रा को उजागर करती है, बल्कि समाज में राष्ट्रीय विचारधारा के प्रचार और महत्व को भी मजबूती प्रदान कर रही है। इसके माध्यम से भारतीय संस्कृति और राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा नई पीढ़ी तक पहुंच रही है, जिससे समाज में वैचारिक जागरण और नैतिक मूल्यों का संचार होता रहता है।