– बाबा साहेब के अनुयायी मनुस्मृति का विरोध क्यों करते हैं, इसे समझने के लिए जातिवादी मानसिकता से ऊपर उठना होगा : मायावती
वेब वार्ता (न्यूज एजेंसी)/अजय कुमार।
लखनऊ। बसपा प्रमुख मायावती ने जगद्गुरु मनुस्मृति से जुड़े विवादित बयान पर कड़ा पलटवार किया है। उन्होंने शनिवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर बिना नाम लिए लिखा कि कुछ साधु-संत केवल सुर्खियों में बने रहने के लिए विवादित बयानबाजी करते रहते हैं। उन्हें संविधान निर्माण में डॉ. भीमराव अंबेडकर के योगदान की सही जानकारी नहीं है, इसलिए गलत बोलने की बजाय चुप रहना ही उनके लिए बेहतर होगा। मायावती ने कहा कि बाबा साहेब के अनुयायी मनुस्मृति का विरोध क्यों करते हैं, इसे समझने के लिए जातिवादी मानसिकता से ऊपर उठना होगा। उन्होंने कहा कि जो साधु-संत इस विषय पर टिप्पणी कर रहे हैं, वे विद्वता के मामले में बाबा साहेब के सामने कुछ भी नहीं हैं, इसलिए उन्हें कुछ भी कहने से पहले खुद को रोकना चाहिए, यही उनके लिए नेक सलाह है।
दरअसल, रामभद्राचार्य ने हाल ही में एक इंटरव्यू में कहा था कि मनुस्मृति भारत का पहला संविधान है और इसमें ऐसा एक भी वाक्य नहीं है जो मौजूदा संविधान के खिलाफ हो। उन्होंने कहा कि यदि डॉ. अंबेडकर संस्कृति को भलीभांति जानते तो मनुस्मृति का विरोध नहीं करते। रामभद्राचार्य से जब पूछा गया कि मनुस्मृति क्या है तो उन्होंने कहा कि यह देश का पहला संविधान है और इसमें कोई भी लाइन भारतीय संविधान के खिलाफ नहीं है। इस दौरान जब डॉ. अंबेडकर की भूमिका पर सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि वे सामाजिक न्याय के नायक नहीं थे और उन्होंने संविधान का निर्माण भी नहीं किया था बल्कि वे सौ सदस्यीय समिति के अध्यक्ष मात्र थे।
रामभद्राचार्य का यह पहला विवादित बयान नहीं है। मार्च 2025 में चित्रकूट स्थित दिव्यांग राज्य विश्वविद्यालय में भारतीय न्याय संहिता 2023 पर आयोजित एक संगोष्ठी के दौरान भी उन्होंने कहा था कि डॉ. अंबेडकर को संस्कृत का ज्ञान नहीं था, इसलिए उन्होंने मनुस्मृति को जलाया। अगर उन्हें संस्कृत आती तो वे ऐसा नहीं करते। उन्होंने यहां तक कहा कि मनुस्मृति की आलोचना की शुरुआत मायावती ने की, जो उसकी वास्तविक सामग्री से अनभिज्ञ थीं।
इससे पहले समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने भी मनु महाराज को लेकर टिप्पणी करते हुए कहा था कि यह हजारों साल पुरानी लड़ाई है, एक मनु महाराज आए थे, जिन्होंने समाज को बांट दिया। इस पर रामभद्राचार्य ने पलटवार करते हुए कहा था कि अखिलेश यादव को संस्कृत का एक भी अक्षर नहीं आता, अगर आते तो वे मनु महाराज पर इस तरह की टिप्पणी नहीं करते।