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मित्रता के फूल, कितने सुगंधित : जय सिंह, I.I.S.

WEB VARTA (NEWS AGENCY)/ AJAY KUMAR/ LUCKNOW

…मित्रता के फूल बहुत कम खिलते है।
क्योंकि मित्रता के फूल खिलने के लिए.!
ऐसे दो व्यक्ति चाहिए जो निष्कपट हो..
जिनके बीच माया न हो।।

✦ दो आत्ममुग्ध जब प्रेम में पड़ते हैं ✦

आज के समय में जब हर व्यक्ति सोशल मीडिया के आईने में स्वयं को देख रहा है, जब लाइक्स और फ़ॉलोअर्स से आत्म-मूल्य तय होता है — तब आत्ममुग्धता एक निजी विकार नहीं, एक सामाजिक प्रवृत्ति बन चुकी है। ऐसे समय में जब दो आत्ममुग्ध लोग प्रेम में पड़ते हैं, तो वह प्रेम क्या वास्तव में प्रेम होता है?

दुनिया दो ऐसे व्यक्तियों को आमने-सामने ला सकती है, जो खुद को ही इतना अधिक पसंद करते हैं कि उन्हें लगता है, वे ही इस ब्रह्मांड का केंद्र हैं। जहां वे खड़े होते हैं, वहां समय थम जाता है। जो चीज़ वे छूते हैं, वह पवित्र हो जाती है — कम से कम उनकी अपनी नज़रों में। जब एक आत्ममुग्ध स्त्री और पुरुष एक-दूसरे से प्रेम करने लगते हैं, तो यह मिलन बाहर से आकर्षक और असाधारण लगता है। दोनों को लगता है, सामने वाला उन्हें पूरी तरह समझता है। एक को लगता है, “यह मेरी ही तरह सोचता है,” दूसरे को लगता है, “यह मेरी ही भाषा बोलता है।” उन्हें लगता है कि यह रिश्ता कुछ बड़ा कर सकता है — जैसे वे साथ मिलकर दुनिया बदल देंगे। असल में, वे एक-दूसरे से नहीं, खुद से प्रेम कर रहे होते हैं। सामने वाला बस एक आईना होता है, जिसमें वे अपना ही प्रतिबिंब देखते हैं। उनकी तारीफें भी एक-दूसरे के लिए कम और स्वयं की महत्ता को प्रमाणित करने की कोशिश ज़्यादा होती हैं।

शुरुआत में सब मोहक लगता है — बातचीत, रुचियाँ, सपने। पर जैसे-जैसे समय बीतता है, असली चेहरा सामने आता है। संबंध का केंद्र ‘दूसरा’ नहीं होता, बल्कि अपनी ही ‘महानता की पुष्टि’ होता है। और जब दोनों को लगने लगे कि दूसरा उनकी ‘महत्ता’ को पर्याप्त सम्मान नहीं दे रहा, तो टकराव शुरू हो जाता है। छोटी-छोटी बातों में उपेक्षा महसूस होती है — एक ने संदेश देर से देखा, दूसरे ने तारीफ की उम्मीद की जो पूरी नहीं हुई। चोट लगती है, लेकिन कोई स्वीकार नहीं करता। एक मौन साधता है, दूसरा व्यंग्य करता है। लेकिन दोनों के भीतर एक ही द्वंद्व चलता है।

“तुमने मेरी महानता को पहचाना क्यों नहीं?” – धीरे-धीरे मतभेद गहराते हैं। जो बातें पहले जुड़ाव का कारण थीं, अब तकरार का बहाना बन जाती हैं। रिश्ते में प्रतिस्पर्धा आ जाती है — कौन ज़्यादा सही है, कौन ज़्यादा समझदार है, किसका प्रभाव अधिक है। प्रेम अब अपने-अपने अहम का युद्ध बन जाता है। और इस पूरे संघर्ष में सबसे ज़्यादा पीसता है रिश्ता — जो कभी प्रेम का प्रतीक था, अब दो ‘महानताओं’ की भिड़ंत का अखाड़ा बन जाता है। दोनों यह साबित करना चाहते हैं कि “मैं तुम्हारे बिना भी संपूर्ण हूं” और “तुम मेरे बिना कुछ नहीं थे।” इस तरह दो आत्ममुग्ध लोगों का प्रेम धीरे-धीरे अहम का युद्ध बन जाता है। भावनाएँ दरकिनार होती हैं, संवाद एकतरफा हो जाते हैं, और अंततः, रिश्ता उन दोनों के ही बोझ से टूट जाता है।

कहते हैं, दो सूरज एक आकाश में नहीं टिक सकते। दो चरम अहंकार भी नहीं – चाहे शुरुआत कितनी भी आकर्षक क्यों न हो, अंततः टकराव तय होता है। और जब ऐसा होता है, तो प्रेम की जगह बचती है सिर्फ राख, जिसमें दोनों खुद को सही साबित करने की कोशिश में जलते रहते हैं। तो क्या आत्ममुग्ध कभी सच्चा प्रेम नहीं कर सकते?

शायद कर सकते हैं — जब वे पहली बार सच में किसी और को देखना शुरू करें… खुद को नहीं।  जब प्रेम ‘प्रतिबिंब’ नहीं, एक ‘दूसरे का अनुभव’ बन जाए — तभी वह ईगो का युद्ध नहीं, आत्मा की संगति बन पाता है।

आप भी किसी के वास्तविक मित्र बने ऐसी शुभकामना !!

(जय सिंह, आईआईएस)

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