वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार
नई दिल्ली। भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर नई दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले पर इस बार स्वतंत्रता दिवस समारोह के पारंपरिक प्रोटोकॉल में पहली बार बड़ा बदलाव देखने को मिला। आधिकारिक समारोह में राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ से पहले राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ का गायन हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में भी इस बदलाव का उल्लेख करते हुए कहा कि आजादी के बाद यह पहली बार है, जब लाल किले पर ‘वंदे मातरम्’ बजाया गया है।
नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा रचित ‘जन गण मन’ को अब तक सरकारी और राजकीय समारोहों में प्रमुख संगीतमय राष्ट्र प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है। वहीं ‘वंदे मातरम्’ का इस्तेमाल मुख्य रूप से सांस्कृतिक और राष्ट्रीय आयोजनों में होता रहा है। हाल में केंद्र सरकार ने ‘वंदे मातरम्’ के पूर्ण संस्करण को राष्ट्रगान के समान कानूनी संरक्षण दिए जाने की दिशा में बदलाव किए हैं।
इस बदलाव की पृष्ठभूमि में ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने का अवसर भी महत्वपूर्ण है। स्वतंत्रता दिवस समारोह की जिम्मेदारी संभालने वाले रक्षा मंत्रालय ने पहले ही घोषणा की थी कि इस अवसर को विशेष रूप से यादगार बनाया जाएगा। नए प्रोटोकॉल के तहत प्रधानमंत्री के लाल किले पहुंचने के बाद सबसे पहले ‘वंदे मातरम्’ बजाया गया। इसके बाद राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया और उस दौरान ‘जन गण मन’ बजाया गया।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम संबोधन के पहले और समापन पर भी ‘वंदे मातरम्’ बजाया गया था। इस बदलाव को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस भी शुरू हो गई है। समर्थक इसे राष्ट्रीय गीत को उसका उचित सम्मान देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मान रहे हैं। वहीं आलोचकों का कहना है कि ‘वंदे मातरम्’ के कुछ पदों में हिंदू धार्मिक प्रतीकों और देवी-देवताओं के संदर्भ होने के कारण इसे सभी समुदायों के लिए समान रूप से स्वीकार्य बनाने को लेकर ऐतिहासिक बहस रही है। उनका तर्क है कि ‘जन गण मन’ भारत की विविधता और बहुलता को अधिक समावेशी ढंग से अभिव्यक्त करता है।
‘वंदे मातरम्’ में भारत को मातृभूमि और पूजनीय मातृ स्वरूप में प्रस्तुत किया गया है तथा इसके बाद के पदों में दुर्गा, सरस्वती और लक्ष्मी जैसे धार्मिक संदर्भ मिलते हैं। ऐसे में लाल किले के समारोह में इसे राष्ट्रगान से पहले स्थान दिए जाने को केवल प्रोटोकॉल में बदलाव नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर जारी व्यापक राजनीतिक और वैचारिक बहस के संदर्भ में भी देखा जा रहा है।