वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार
लखनऊ। इंडियन एकेडमी ऑफ ट्रॉपिकल पैरासिटोलॉजी के तत्वावधान में डॉ. राम मनोहर लोहिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, लखनऊ के माइक्रोबायोलॉजी विभाग द्वारा 30 और 31 जनवरी को न्यूरोसिस्टिसरकोसिस के लेबोरेटरी निदान पर दो दिवसीय आईएटीपी राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला का उद्देश्य इस परजीवी रोग के समय पर, सटीक और सुरक्षित निदान को बढ़ावा देना रहा।
कार्यशाला की शुरुआत प्रो. नुज़हत हुसैन के सत्र से हुई, जिसमें उन्होंने न्यूरोसिस्टिसरकोसिस के क्लिनिकल व हिस्टोपैथोलॉजिकल पहलुओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि भारत में नॉन-न्यूरोनल सिस्टिसरकोसिस अधिक पाया जाता है और कंकाल की मांसपेशियां सबसे अधिक प्रभावित होती हैं। इसके बाद प्रो. के.एन. प्रसाद ने उत्तरी भारत में रोग की महामारी विज्ञान पर व्याख्यान देते हुए सूअरों की कुछ आबादी में 3.5 प्रतिशत तक सिस्टिसरकोसिस पाए जाने को गंभीर चिंता बताया।
प्रो. उज्जला घोषाल ने निदान की आधुनिक विधियों पर चर्चा करते हुए एमआरआई को सर्वोत्तम रेडियोलॉजिकल तकनीक और ईआईटीबी को सर्वाधिक संवेदनशील सेरोलॉजिकल जांच बताया। डॉ. साकिब ने गुणवत्तापूर्ण और सुरक्षित प्रयोगशाला प्रक्रियाओं की आवश्यकता पर बल दिया। उद्घाटन सत्र में प्रो. उज्जला घोषाल ने आईएटीपी की 20 वर्षों की यात्रा और 17 राज्य चैप्टरों की जानकारी दी।
प्रो. एस.सी. परिजा ने इसे उत्तर प्रदेश में अपनी तरह की पहली राष्ट्रीय कार्यशाला बताते हुए आयोजन टीम की सराहना की और स्वच्छता, शीघ्र निदान व उचित प्रबंधन पर जोर दिया। कार्यशाला में ईआईटीबी, एलिसा, माइक्रोस्कोपी और हिस्टोपैथोलॉजिकल स्लाइड्स पर हैंड्स-ऑन डेमोंस्ट्रेशन सत्र आयोजित किए गए।
दूसरे दिन न्यूरोइमेजिंग, मॉलिक्यूलर डायग्नोसिस और नैतिकता पर सत्र हुए। समापन अवसर पर प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र वितरित किए गए और आपसी संवाद के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।