वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार
लखनऊ। मानदेय बढ़ाने समेत अन्य मांगों को लेकर आशा वर्करों का आक्रोश लगातार बढ़ता जा रहा है। लखनऊ के हजरतगंज में बड़ी संख्या में आशा वर्करों ने प्रदर्शन किया और सरकार के खिलाफ नाराजगी जताई। प्रदर्शन में शामिल अमेठी की एक आशा वर्कर ने भावुक होते हुए बताया कि ड्यूटी के कारण उन्होंने अपनी ही बेटी का बच्चा खो दिया। उन्होंने कहा कि एक ओर बेटी गर्भवती थी और उसकी तबीयत खराब थी, तभी दूसरी महिला के प्रसव की सूचना आई। बेटी को अकेला छोड़कर वह ड्यूटी पर चली गईं, लेकिन समय पर इलाज न मिलने से उनकी बेटी के नवजात की मौत हो गई।
एक आशा वर्कर 24 घंटे काम करती हैं, लेकिन बदले में मात्र 3500 रुपये महीना मानदेय मिलता है, जिसमें घर चलाना बेहद मुश्किल है। उन्होंने बताया कि अपनी समस्याएं अधिकारी, नेता और मंत्रियों तक पहुंचाई गईं, लेकिन अब तक कोई ठोस सुनवाई नहीं हुई।
प्रदेश में करीब एक लाख 70 हजार आशा वर्कर विभिन्न मांगों को लेकर आंदोलनरत हैं। आशा बहुओं का कहना है कि वे सरकार की जनकल्याणकारी स्वास्थ्य योजनाओं को गांव-गांव तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाती हैं और स्वास्थ्य विभाग की रीढ़ मानी जाती हैं। कोरोना काल में भी उन्होंने जान जोखिम में डालकर सेवाएं दीं, लेकिन आज उन्हें सम्मान और उचित मानदेय नहीं मिल रहा है।
महाराजगंज की वर्कर ने बताया कि वह वर्ष 2006 से सेवाएं दे रही हैं। शुरुआती तीन वर्षों तक उन्हें कोई मानदेय नहीं मिला और मुफ्त में काम करना पड़ा। वर्ष 2009 में पोलियो अभियान के दौरान 75 रुपये मिलने लगे, जो आज भी वही हैं। तमाम जिम्मेदारियों के बावजूद महीने में कुल 3500 रुपये ही मिल पाते हैं, जिससे न तो बच्चों की पढ़ाई हो पाती है और न ही इलाज संभव है।
आशा वर्करों ने चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो वे हड़ताल पर जाएंगी। उन्होंने कहा कि वे अपने अधिकारों के लिए पीछे हटने वाली नहीं हैं और संघर्ष जारी रहेगा।