Breaking News

वायु प्रदूषण से निपटने के लिए IIT कानपुर और IBM की साझेदारी

– उत्तर प्रदेश में AI& आधारित वायु गुणवत्ता निगरानी और समाधान की शुरुआत
वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार
लखनऊ। वायु प्रदूषण की चुनौती से निपटने के लिए आईआईटी कानपुर के ऐरावत रिसर्च फाउन्डेशन जो सतत शहरी विकास हेतु आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का सेण्टर आॅफ एक्सीलेन्स है, ने आईबीएम के साथ एक महत्वपूर्ण साझेदारी की घोषणा की है। यह पहल उत्तर प्रदेश में AI& सक्षम, वास्तविक समय आधारित और स्थानीय साक्ष्य-आधारित वायु गुणवत्ता प्रबंधन को साकार करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। इसका उद्देश्य आर्थिक विकास और पर्यावरणीय सततता के बीच संतुलन बनाते हुए विकसित भारत के राष्ट्रीय दृष्टिकोण को समर्थन देना है। इस साझेदारी के तहत एक व्यापक AI& आधारित वायु गुणवत्ता स्टैक (Air Quality Stack) विकसित किया जा रहा है, जो किफायती देसी सेंसर और उन्नत मशीन लर्निंग मॉडलों के माध्यम से प्रदूषण स्रोतों की पहचान, हॉटस्पॉट विश्लेषण और सटीक नीति-निर्धारण में मदद करेगा।
मुख्य अतिथि अनिल कुमार, प्रमुख सचिव, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन विभाग, ने कहा कि “यूपी एक बड़ा राज्य है और इसकी अधिकांश आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है। ब्लॉक स्तर पर की गई निगरानी से यह पता चला है कि आजमगढ़, कुशीनगर, श्रावस्ती जैसे जिलों की हवा कई शहरी क्षेत्रों से भी ज्यादा खराब है। आईआईटी कानपुर की तकनीक से हमें अब वास्तविक समय में यह जानकारी मिल रही है कि कहाँ दखल जरूरी है, और किस स्थान पर कौन सी योजना लागू की जाए। यह एक बड़ी उपलब्धि है।” राज्य सरकार ने ‘ग्रीन बजट’, वृक्षारोपण, स्वच्छ भारत अभियान जैसे कई प्रयास किए हैं। वायु गुणवत्ता में सुधार के लिए हमने न्च् ब्।डच् नाम से ₹5,000 करोड़ का वर्ल्ड बैंक समर्थित कार्यक्रम तैयार किया है, जो जल्द शुरू होगा।”
रवींद्र प्रताप सिंह, अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने कहा कि आईआईटी कानपुर की यह तकनीक पारंपरिक स्टेशनों की तुलना में ज्यादा बारीक डेटा देती है। वायु गुणवत्ता जैसे बड़े मुद्दे के समाधान के लिए हमें पर्याप्त और सटीक डेटा की जरूरत है। खासकर स्रोत विश्लेषण के लिए। हालांकि सरकारी संसाधन सीमित हैं, लेकिन हम इस तकनीक को अपनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।”
अंशिका राजखोआ ने बताया कि कोटक स्कूल आॅफ सस्टेनबिलिटी के डीन और ऐरावत रिसर्च फाउन्डेशन के परियोजना निदेशक प्रो. सच्चिदानंद त्रिपाठी के नेतृत्व में उनकी टीम ने उत्तर प्रदेश और बिहार के 1,365 प्रशासनिक ब्लॉकों में कम लागत वाले देसी सेंसर स्थापित किए हैं, जिससे भारत का पहला एयरशेड आधारित फ्रेमवर्क तैयार किया गया है। इनसे प्राप्त डेटा से हम अब PM2.5 की गणना 0.5 वर्ग किमी तक की सूक्ष्मता पर कर सकते हैं। लखनऊ जैसे शहर में हम प्रतिदिन 2 लाख डेटा पॉइंट्स जेनरेट कर पा रहे हैं।”
प्रो. त्रिपाठी ने बताया, “हमने पूरे डेटा पर आधारित एयरशेड सीमाएं तैयार की हैं न कि सिमुलेशन मॉडल पर। प्रो. त्रिपाठी की टीम द्वारा विकसित मोबाइल एयर क्वालिटी लैब अत्याधुनिक उपकरणों से लैस है, जो प्रदूषण स्रोतों की पहचान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। लखनऊ में केवल 12 दिनों की तैनाती में इस लैब ने औद्योगिक प्रदूषण स्रोत, धातु-आधारित प्रदूषक, ई-कचरे का जलना, और कोयले का दहन जैसे सटीक स्रोत उजागर किए। प्रो. त्रिपाठी ने कहा कि यह साझेदारी न केवल उत्तर प्रदेश के लिए बल्कि पंजाब जैसे उन राज्यों के लिए भी मॉडल बन सकती है, जो शीतकालीन प्रदूषण से जूझते हैं। यह राज्य और जिले पार सहयोग को बढ़ावा देती है और एक राष्ट्रीय स्तर की पुनरुत्पादक प्रणाली का निर्माण करती है।
मोबाइल लैब मापनों और सेंसर डेटा को प्रशिक्षित करके एक एआई पाइपलाइन विकसित की गई है जो विभिन्न प्रदूषण स्रोतों की पहचान कर सकती है, जैसे कि :-
’ दहन से उत्पन्न प्रदूषण (जैसे बायोमास, वाहनों से)
’ धूल और अन्य नॉन-एग्जॉस्ट उत्सर्जन
’ पटाखों से होने वाला प्रदूषण
’ रीयल-टाइम में स्थान विशेष के हॉटस्पॉट्स
यह प्रणाली न केवल प्रकार और तीव्रता बल्कि प्रदूषण के समय को भी दर्शाती है, जिससे स्थान और समय आधारित हस्तक्षेप संभव होता है।

Check Also

5 दिवसीय बैंकिंग की मांग पर बैंककर्मियों का आंदोलन तेज, 27 जनवरी को राष्ट्रव्यापी हड़ताल

वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमारलखनऊ। बैंकों में पांच दिवसीय कार्य प्रणाली लागू किए जाने …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Live Updates COVID-19 CASES