वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार
लखनऊ। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पौराणिक महत्व के स्थल प्रयागराज (इलाहाबाद) की एक दिवसीय यात्रा अविस्मरणीय रही। प्रयागराज की यात्रा के दौरान अखिलेश यादव ने पौराणिक महत्व के अक्षयवट, ऐतिहासिक अकबर का किला, धार्मिक आस्था का प्रतीक सरस्वती कूप की प्राचीनता का जीवंत अनुभव किया। इस यात्रा के दौरान श्री यादव ने जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभनाथ (आदिनाथ) जी के केवल ज्ञान प्राप्ति स्थल अक्षयवट, प्रयागराज में असीम शांति देने वाले वृक्ष का दर्शन भी किया।
प्रयागराज की यात्रा के दौरान पूर्व राज्यसभा सांसद किरणमय नंदा और पूर्व कैबिनेट मंत्री राजेंद्र चैधरी भी साक्षी रहे। इससे पूर्व प्रयागराज में आयोजित महाकुम्भ में अखिलेष यादव ने प्रयागराज यात्रा के दौरान संगम में स्नान किया था। इस अवसर पर उनके पुत्र अर्जुन यादव एवं पूर्व कैबिनेट मंत्री राजेन्द्र चैधरी मौजूद रहे।
श्री यादव अपने राजनैतिक कार्यक्रमों से जुड़ी यात्राओं के दौरान भी समाज, संस्कृति, साहित्य सहित अन्य विभिन्न विधाओं से जुड़े स्थलों का भ्रमण जरूर करते हैं। जिसके माध्यम से वे भारत की विविधता और अनेकता में एकता का संदेश देने का प्रयास करते हैं। प्रयागराज, जो पूर्व में इलाहाबाद के नाम से जाना जाता था, वहां की सांझी विरासत पूरे देश के लिए अनुकरणीय है। यह ज्ञान, वैराग्य और अतीत के अद्भुत संगम की नगरी है। विविध धर्मों के पूज्य स्थल होने के साथ यहां की सामाजिक संस्कृति की जड़ें हजारों साल पुरानी है। एक दूसरे की मान्यताओं का सम्मान करते हुए कैसे समृद्ध और सुखी रहा जा सकता है यह प्रयागराज की जीवन शैली शैली में रचा बसा है। बताते चलें कि प्रयागराज (इलाहाबाद) साहित्य-संस्कृति का भी केन्द्र रहा है। हिंदी कवियों की वृहत्त्रयी सुमित्रा नंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और महादेवी वर्मा के अतिरिक्त यह भूमि हरिवंश राय बच्चन, अकबर इलाहाबादी और फिराक गोरखपुरी की भी रही है। गांधी और डॉ0 राममनोहर लोहिया का प्रयागराज से गहरा नाता रहा है। यहां के लेखकों, कवियों, संस्कृति कर्मियों के साथ सिविल लाइन्स कॉफी हाउस में उनकी बैठकें जब तब होती रहती थी। स्वतंत्रता आंदोलन के बाद समाजवादी आंदोलन का भी यह गढ़ रहा है।
प्रयागराज वस्तुतः एक पौराणिक ख्याति की नगरी है जो गंगा, यमुना, सरस्वती नदियों के संगम पर स्थित है। यहां हर 12 वर्ष में कुंभ, छह वर्ष में अधकुंभ और हर वर्ष माघ मेला होता है। कहते हैं कि प्रयागराज में ब्रह्मा जी ने यज्ञ किया था और आदि शंकराचार्य ने तपस्या की थी। प्रयागराज में एक मजबूत किला बनाने की मुगल सम्राट अकबर के मन में बहुत इच्छा थी। अकबर ने 1583 में संगम तट पर इसका निर्माण कराया। इसे राष्ट्रीय महत्व के स्मारक की मान्यता मिली है। इसमें तीन गैलरी है जिनके दोनों ओर ऊंची मीनारे है। सन् 1798 में यह किला ईस्ट इंडिया कम्पनी को अवध के नवाब सआदत अली ने सौंप दिया। वर्तमान में इस किले के कुछ भाग को ही पर्यटकों के लिए खोला जाता है। बाकी हिस्से का प्रयोग भारतीय सेना करती है। सैलानियों को जोधाबाई महल, अशोक स्तंभ और सरस्वती कूप देखने की इजाजत है।
नेताजी मुलायम सिंह यादव ने अपने रक्षा मंत्री के कार्यकाल में यहां दर्शन की सुचारू व्यवस्था कराई थी। अकबर के किले में महारानी जोधाबाई का शयन कक्ष लंबी सुरंग के बाद है। वह नाव से संगम से किला तक पहुंचती थी। श्री यादव ने सुरंग में खुद जाकर देखा। किले में एक जनानी महल है, जिसे जहांगीर महल भी कहते हैं।
अकबर के किले में प्रसिद्ध अक्षयवट स्थापित है। अखिलेश यादव बार-बार यह मांग करते रहे हैं कि केन्द्र सरकार को अकबर का किला उत्तर प्रदेश सरकार को स्थानांतरित करना चाहिए। अक्षयवट को मनोकामना पूर्ण करने वाला ’मनोरथ वृक्ष’ भी कहा जाता है। कहा जाता है कि वाल्मीकि रामायण में भी अक्षयवट का उल्लेख है। ब्रह्माजी ने यहां यज्ञ किया था। भगवान विष्णु यजमान और भगवान शिव देवता बने थे। इन तीन देवों के शक्तिपुंज से उत्पन्न वृक्ष ही अक्षयवट है। इस वट वृक्ष की उम्र 5270 वर्ष बताई जाती है। ऋषि मार्कंडेय ने इस वट वृक्ष के नीचे तपस्या की थी। जैन समाज मानता है कि उनके तीर्थंकर ऋषभ देव ने अक्षयवट के नीचे तपस्या की थी। मान्यता है कि ऋषि शुकदेव, ऋषि भारद्वाज, ऋषि जमदग्नि, ऋषि विश्वामित्र, ऋषि गौतम, ऋषि व्यास, ऋषि कपिल भी वट वृक्ष से संबंधित रहे हैं। कहा जाता है कि अक्षय वट के नीचे बैठकर ऋषि शुकदेव ने अर्जुन के पोते परीक्षित को श्रीमद्भागवत पुराण सुनाया था। इसके अलावा, एक मान्यता यह भी है कि बाल रूप में भगवान श्रीकृष्ण इसी वट वृक्ष पर विराजमान हुए थे। श्रीहरि इसके पत्ते पर शयन करते हैं। पद्म पुराण में अक्षयवट को तीर्थराज प्रयाग का ’छत्र’ कहा गया है।
प्रयागराज की यात्रा अक्षयवट के अलावा सरस्वती कूप के दर्शन के बिना पूर्ण नहीं मानी जाती है। माना जाता है कि सरस्वती कूप प्राचीन काल में सरस्वती नदी का उद्गम स्थल था। यह सरस्वती नदी के गुप्त संगम के पास स्थित है। यह ऐतिहासिक और आध्यात्मिक स्थल के रूप में विख्यात है।
श्री यादव ने सरस्वती कूप और अक्षयवट दोनों की पूजा की। सूबेदार मेजर आरएन पाण्डेय ने विधिवत पुजारी के रूप में पूजा कराई। अखिलेश यादव ने प्रयागराज के धार्मिक स्थलों में गहरी रुचि दिखाई है। वह लेटे हुए हनुमान जी के भी दर्शन कर चुके है। यहां श्री यादव साधु संतो तथा आश्रमों के भी संपर्क में भी रहे हैं। भारत की आध्यात्मिक परम्परा एवं मान्यताओं के प्रति श्री अखिलेश यादव की गहरी आस्था एवं श्रद्धा है। संगम की रेती पर भ्रमण के दौरान अखिलेश यादव से संवाद के क्रम में पर्यटकों ने 2013 के महाकुंभ की भव्यता से जुड़ी सुखद स्मृतियों को साझा किया। स्मरण रहे कि अखिलेश यादव के मुख्यमंत्रित्वकाल में प्रयागराज में 2013 में सम्पन्न हुए कुंभ के प्रबंधन की सराहना अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटीः साउथ एशिया इंस्टीट्यूट द्वारा की गई है जो ‘‘कुंभ मेला-एक क्षणिक महानगर का प्रतिचित्रण‘‘ शीर्षक से एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ है।
(लेखकः राजेन्द्र चैधरी उत्तर प्रदेश सरकार में पूर्व कैबिनेट मंत्री रहे हैं। वर्तमान में समाजवादी पार्टी से उत्तर प्रदेश की विधान परिषद के सदस्य हैं।)’