वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार
लखनऊ। अंतर्राष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ (इस्कॉन) की स्थापना की प्रेरक यात्रा का स्मरण करते हुए इस्कॉन मीडिया समूह ने बताया कि 13 अगस्त 1965 को श्रील ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद अपने गुरु श्रील भक्ति सिद्धांत सरस्वती ठाकुर के निर्देशों का पालन करते हुए मात्र 40 रुपये के साथ समुद्री कार्गो जहाज से अमेरिका रवाना हुए थे। उनका उद्देश्य श्री चैतन्य महाप्रभु की शिक्षाओं और भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति का विश्वभर में प्रचार-प्रसार करना था।
अमेरिका पहुंचने के बाद श्रील प्रभुपाद को प्रारंभिक दिनों में आर्थिक और सामाजिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उन्होंने न्यूयॉर्क के एक साधारण क्षेत्र में रहकर अपने मिशन की शुरुआत की। उस समय वहां का युवा वर्ग नशे और अन्य व्यसनों से जूझ रहा था। श्रील प्रभुपाद ने श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीमद्भागवत के आध्यात्मिक संदेश के माध्यम से युवाओं को नई दिशा देने का प्रयास किया और उन्हें भक्ति योग के मार्ग से जोड़ने का कार्य किया। लगातार 11 माह के संघर्ष के बाद श्रावण मास कृष्ण पक्ष नवमी के दिन अमेरिका में अंतर्राष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ (इस्कॉन) की स्थापना हुई। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति और सनातन वैदिक संस्कृति का संदेश तेजी से विश्व के विभिन्न देशों तक पहुंचा।
इस्कॉन के अनुसार श्रील प्रभुपाद ने अल्प समय में ही भक्ति आंदोलन को वैश्विक स्वरूप प्रदान किया और लगभग 10 वर्षों में 108 श्रीकृष्ण मंदिरों की स्थापना कराई। उनका उद्देश्य मानव समाज को भगवान श्रीकृष्ण की प्रेममयी सेवा और आध्यात्मिक जीवन से जोड़ना था। आज इस्कॉन दुनिया के अनेक देशों में आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों के माध्यम से श्रीकृष्ण भक्ति का संदेश प्रसारित कर रहा है।