वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में यूजीसी बिल को लेकर छिड़े सियासी घमासान ने अब भाजपा के भीतर भी असहजता पैदा कर दी है। छात्र संगठनों के विरोध और विभिन्न सामाजिक वर्गों की प्रतिक्रियाओं के बीच पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बयान चर्चा का केंद्र बन गए हैं। उन्नाव से भाजपा सांसद साक्षी महाराज और पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह के हालिया वक्तव्यों ने राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है।
साक्षी महाराज ने सामाजिक समीकरणों का हवाला देते हुए कहा कि यदि ओबीसी और एससी समाज इस मुद्दे को अपने हितों के खिलाफ मानकर एकजुट हो गया तो इसके दूरगामी राजनीतिक परिणाम हो सकते हैं। उन्होंने ‘90 बनाम 10’ की आशंका जताते हुए पार्टी नेतृत्व से सावधानी बरतने की अपील की और कहा कि अनावश्यक विवाद से बचना चाहिए। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में छात्रों के प्रदर्शन तेज हुए हैं। वहीं बृजभूषण शरण सिंह ने जमीनी प्रतिक्रिया का जिक्र करते हुए दावा किया कि गांवों में इस बिल को लेकर असंतोष फैल रहा है। उन्होंने कहा कि केवल एक वर्ग ही नहीं, बल्कि विभिन्न सामाजिक समूहों में सवाल उठ रहे हैं। उनके अनुसार, दिल्ली की राजनीतिक बहस और ग्रामीण क्षेत्रों की भावना में अंतर दिखाई दे रहा है। इन बयानों को पार्टी के भीतर अलग-अलग राय के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
इधर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मौके को भांपते हुए भाजपा पर सीधा हमला बोला है। उन्होंने ‘भाजपा हटाओ, सनातन बचाओ’ का नारा देते हुए संत समाज के मुद्दे को भी इससे जोड़ा और सरकार पर परंपरागत मूल्यों की अनदेखी का आरोप लगाया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यूजीसी बिल अब केवल शैक्षिक सुधार का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह सामाजिक और चुनावी समीकरणों से जुड़ा बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है। आने वाले दिनों में इस पर भाजपा की रणनीति और विपक्ष की आक्रामकता प्रदेश की राजनीति की दिशा तय कर सकती है।