– जिन्होंने अपमान किया, उन्हें औकात दिखानी होगी
– प्रस्ताव में प्रशासन ने घटना के लिए माफी नहीं मांगी, कल मुझे माघ मेला प्रशासन की ओर से एक पत्र और प्रस्ताव भेजा गया। इसमें कहा कि मुझे पूरे सम्मान के साथ पालकी से संगम ले जाकर स्नान कराया जाएगा। मुझ पर फूल बरसाए जाएंगे, लेकिन मैंने प्रस्ताव को ठुकरा दिया। जब दिल में दुख और गुस्सा हो, तो पवित्र पानी भी शांति नहीं दे पाता – शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद
वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार
प्रयागराज। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने प्रयागराज के माघ मेला को बीच में ही छोड़ दिया। बुधवार सुबह प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद वे काशी के लिए रवाना हो गए। उन्होंने कहा, आज मन इतना व्यथित है कि बिना स्नान किए विदा ले रहे हैं। प्रयागराज हमेशा आस्था और शांति की धरती रही, लेकिन ऐसी घटना की कल्पना नहीं की थी। इस घटना ने मेरी आत्मा को झकझोर दिया और न्याय, मानवता के प्रति विश्वास कमजोर कर दिया।
माघ मेला 15 फरवरी तक चलेगा, जिसमें माघी पूर्णिमा (1 फरवरी) और महाशिवरात्रि (15 फरवरी) के स्नान बाकी हैं। शंकराचार्य ने विवाद के कारण 18 दिन पहले ही मेला त्याग दिया। मौनी अमावस्या को प्रशासन से विवाद हुआ, बसंत पंचमी पर भी स्नान नहीं किया। अब वे शेष स्नानों में शामिल नहीं होंगे। उन्होंने कहा, मैंने मौन रखकर प्रार्थना की कि अपमान करने वालों को दंड मिले। मेरे सम्मान को ठेस पहुंचाई गई, इसके पीछे राज्य सरकार जिम्मेदार है। प्रशासन के प्रस्ताव में मौनी अमावस्या की घटना के लिए माफी नहीं मांगी गई। असली सम्मान तब होता जब गलती मानकर सच्चे मन से माफी मांगते। मूल घटना की जिम्मेदारी लेकर दोषी माफी मांगें, तभी प्रस्ताव स्वीकार होगा। वरना भक्तों का अपमान दब जाएगा। अगर पहले पालकी से स्नान गलत था, तो अब सही कैसे? संतों, संन्यासियों व ब्रह्मचारियों के साथ मारपीट और अपमान की भरपाई दिखावे से नहीं होगी। किसकी जीत-हार हुई, सनातनी समाज फैसला करेगा। मुगलों के समय जैसा हो रहा है। 11 दिनों में हमारी प्रतिष्ठा की हत्या का प्रयास हुआ। इसके पीछे उत्तर प्रदेश शासन है। अन्याय के प्रतिकार में आगे आंदोलन होगा। युवाओं से अपील है, सनातनी प्रतीकों का अपमान करने वालों को औकात दिखाएं।
बताते चलें कि 18 जनवरी को माघ स्नान के लिए पालकी रोकी गई। विरोध पर शिष्यों से धक्का-मुक्की, शिखा पकड़कर घसीटने का आरोप। शंकराचार्य शिविर से बाहर धरने पर बैठे। 11 दिनों से शिविर में प्रवेश नहीं। प्रशासन ने दो नोटिस जारी कर शंकराचार्य होने का प्रमाण मांगा, जिसका जवाब दिया। सीएम योगी ने बिना नाम ‘कालनेमि’ कहा, तो शंकराचार्य ने तुलना औरंगजेब से की। संत समाज दो हिस्सों में बंटा, लेकिन तीनों शंकराचार्य समर्थन में। माफी की मांग पर अड़े। बरेली सिटी मजिस्ट्रेट ने समर्थन में 26 जनवरी को इस्तीफा दिया, तो अयोध्या डिप्टी कमिश्नर ने सीएम के पक्ष में रिजाइन किया।