वेब वार्ता (न्यूज़ एजेंसी)/ अजय कुमार
लखनऊ। वर्ष 2025 भारत की श्रम व्यवस्था के लिए एक निर्णायक मोड़ के रूप में उभरा है। लंबे समय से चली आ रही उन बाधाओं को दूर करने की दिशा में ठोस कदम उठाए गए, जिनके कारण अधिशेष श्रम औपचारिक अर्थव्यवस्था में समाहित नहीं हो पा रहा था। स्वतंत्रता के बाद लागू कठोर श्रम कानूनों ने उद्योगों को श्रम-गहन निवेश से हतोत्साहित किया, लेकिन चार श्रम संहिताओं और विकसित भारत–रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण) ने इस स्थिति को बदलने का मार्ग प्रशस्त किया है। अब शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में औपचारिक रोजगार के नए अवसर बन रहे हैं।
चीन, वियतनाम और इंडोनेशिया ने 1990 और 2000 के दशक में श्रम कानूनों को सरल बनाकर बड़े पैमाने पर विनिर्माण को बढ़ावा दिया। इसके विपरीत भारत में अनुमतियों और दंडों का जटिल ढांचा खड़ा हो गया था। 29 श्रम कानूनों को चार संहिताओं में समेटने से अनुपालन आसान हुआ है, श्रमिक सुरक्षा बनी रही है और उद्योगों को भर्ती में लचीलापन मिला है। ग्रामीण क्षेत्रों में मनरेगा की सीमाओं को समझते हुए विकसित भारत–रोजगार एवं आजीविका मिशन ने उत्पादकता आधारित रोजगार को बढ़ावा दिया है और बुआई-कटाई के दौरान 60 दिन का विराम देकर कृषि को राहत दी है।
छोटी विनिर्माण इकाइयों के लिए एकल पंजीकरण, लाइसेंस और रिटर्न की व्यवस्था से लागत घटी है। निरीक्षण प्रणाली को सुविधा-उन्मुख बनाया गया है और मामूली त्रुटियों पर आपराधिक दायित्व समाप्त किया गया है। मजदूरी सुरक्षा, लिंग समानता, गिग वर्कर्स की सामाजिक सुरक्षा और प्रवासी श्रमिकों की पोर्टेबिलिटी ने श्रमिकों का भरोसा बढ़ाया है। औपचारिक भर्ती अब जोखिम नहीं बल्कि आत्मविश्वास का प्रतीक बन गई है।
एमएसएमई के लिए निवेश और टर्नओवर की सीमा बढ़ने से विस्तार को बल मिला है। पीएफओ सुधारों ने श्रमिकों को औपचारिक तंत्र से जोड़ना आसान किया है। मनरेगा ने गरीबी घटाने में भूमिका निभाई, पर स्थायी परिसंपत्तियों की कमी रही। नए मिशन ने जल सुरक्षा, ग्रामीण आधारभूत ढांचे, आजीविका और आपदा न्यूनीकरण पर फोकस किया है। स्वतंत्रता के बाद पहली बार श्रम नीति भविष्योन्मुखी बनी है, जिसमें श्रम को नियंत्रण की वस्तु नहीं बल्कि विकास का साझेदार माना गया है।